Tuesday, October 28, 2014

वो आदमी

कल मैं मिली मौत से पहले मरे हुए आदमी से, जो पूरी सभ्यता को भद्दी गालियों से गरियाता है, और अपने पार्थिव शरीर को ढ़ोता लतियाता है, वो अपनी ही धुन में रमता हठी सा योगी है, घुम्मकड प्रवृति का, रह्गिरी के गुण में माहिर जोगी है I
उसके अन्दर है एक आग, जो जीवित रखे है उसे आज भी, वो है उसका सतत विचारों से जूझना, भटकना निरंतर भटकना और भटकना, फिर एक दिन कवितायेँ फूटतीं है अचानक, सोतों सी उसके अंतस से, और वो कविताओं का जखीरा लिए विजयी भाव से, कोलंबस सा मुस्कुराता है, जैसे उसकी खोज हुई पूरी, उसकी बेचैनी को विराम मिला, और फिर वो हो जाता है रीता सूखे घड़े सा, बदरंग गरियाता अपनी लाश को लात से ठेलता, तिल-तिल मरता अपने पार्थिव शरीर को ढ़ोता I
उसके मृत शरीर से एक तीव्र सड़ांध है उठती, जो नथुनों से है टकराती, नाक के बाल तक है जला जाती, असहनीय सी दुर्गन्ध जो मन को विचलित कर जाती, अपान वायु के प्रभाव से उपजे वैराग्य भाव सी, लेकिन उसके विचारों की उर्जा उस दुर्गन्ध को दबा जाती, और वो सड़ांध हो विलीन कहीं, यथार्थ के धरातल को है घूरती, यकायक गड्डों में धंसी वो आंखें है मुस्कुराती, और तब आता है समझ, कि कैसे मर चुका वो शरीर, आज भी जीने की चाह को करता पोषित है, और मौत से नज़रे चुराता है गरियाता है लतियाता है लेकिन जब बात आती है जिन्दगी की, तो पोपले से गालों टूटते हुए दांतों बिखरे बेतरतीब से बालों में, मुस्कुराता जिन्दगी के नगमे गाता है I
कभी आसमान में धान रोपने में तल्लीन, कभी अपनी कविताओं में उपनिषदों का आत्मवाद, बुद्धिष्ट अनात्मवाद, भक्तों का मानवतावाद और कम्युनिष्टों का समतावाद, समाहित करने की तत्परता के साथ विश्व संस्कृति की बात करता वो, कभी ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार कर उसमे लीन होने को आतुर, कर्मठता का यहीं भाव है, जो उसे मरने नहीं देता I
घूरकर देखना और फिर पागल समझे जाने की बात सोच, शरमा जाना और फिर हिचकते हुए मन के इस भाव की व्याख्या करना, और खुलकर मुस्कुराना उसका कर जाता है चकित, ऐसी निश्चलता सहजता सरलता और विचारो की गूढता, क्या दिखती है तथाकथित बुद्धिजीवी सभ्य समाज में ? जो मुखौटों के आवरण ओढे अपने दंभ में आसमां की तरफ मूह कर, थूकने को अमादा है, इस सत्य से अनभिज्ञ की वो थूक गिरेगा उनके ही मूह पर I
वो मात्र अभिनय है नहीं करता नेता होने का, केवल चिल्लाकर आश्वासन के टुकड़े नहीं है फेंकता, वो परचम है लहराता उस विश्वास का, जो उसकी धंसी आँखों में जिन्दा है, कि बदलेगा सब, सिर्फ आग चाहिए, और वो उसी आग को पाने की ललक में, प्रयास है करता फूंक मारता निरंतर बुझी राख में, चिंगारी पैदा करने के अथक प्रयास में लीन !
वो संत परंपरा और मौखिक परंपरा का उतराधिकारी कहलाता है, और इस बात से उसके मन में फैलाव का एक सागर लहराता है, वो चूहे पर हाथी के सवार होने की बात को जायज़ ठहराता है, वहीँ चूहे पर हाथ के सवार होने को सिरे से खारिज है करता, जो ये दर्शाता है, कि उसकी संवेदनाये अभी सजीव है, और ये जीवंतता जो यकायक उसके मुख पर पसर जाती है, शरीर की नश्वरता को ठेंगा दिखाती उस मरे हुए आदमी में जीने की ललक जगा जाती है I *******************************************

Monday, October 13, 2014

शब्द


शब्द 
पूर्ण समर्पण है मांगते 
अधूरे मन से 
कुछ नहीं होता हासिल 
शब्द 
समय के मोहताज़ नहीं होते 

शब्द
पूस की दुपहरी में 
सूरज की आंच पा मुस्कुराते है 
शब्द
वक़्त की तेज़ आंधी में 
कभी उड़कर कहीं खो जाते है 

शब्द
बारिश में भीग कर 
कभी सीले से नज़र आते है 
शब्द
जेठ की गर्म लू 
में झुलस धूमिल हुए जाते है

शब्द
मरू की भटकन में कभी 
मृगतृष्णा के मोह में नीर बहाते है 
शब्द
को अगर राह मिल जाए 
तो इन्द्रधनुष से ये बिखर जाते है 

शब्दों को 
मोहलत की अलगनी पर छोड़ देना 
स्वयं को 
परिस्थिति से बहलाना भर ही तो है 

शब्द 
होते बावरे 
अपनी मर्जी के मालिक 
थोड़ी सी ढील 
में फिसल जाते रेत की तरह 

शब्द
छोड़ते ही हाथ 
उड़ जाते आवारा बादल बन 
और ये बादल 
बरस जाते फिर कहीं और 
तुम्हारे आँगन में 
रह जाती केवल तपिश उनकी

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Friday, October 10, 2014

पेंडुलम सी जिन्दगी

पेंडुलम की टिक टिक सी दिल की धड़कन और ख़ामोशी के सायें हाँ शांति है चहुँ ओर सन्नाटे की चादर ताने
शांति जानते हो कैसी ? तूफ़ान के पहले सी जाने कब लहरे आवेग में खो दे अपना संतुलन मौसम बिगड़ जाए काले काले बादल घिर आये और बरस जाए
लेकिन ये बारिश तपन देती है इस तपन से गरमा जाता है माहौल सारा चुभता कुछ फांस सा पीड़ा का एहसास बेचैनी भर जाता अंतस में
इसी ओह्पोह की हालत में मन को समझाने का निरर्थक सा प्रयास है जीवन कभी समझ पाता मन और कभी रह जाता बहुत कुछ उलझा हुआ
बस ऐसे ही चलती है जिन्दगी कभी मुस्कुराहट में अपनी पीड़ा को सहेजती कभी बेचैनी छू जाती सांसों को उसकी
फिर अगले ही पल सारी परेशानियों को सहेज कर रख देती वो एक आले में और निकल पड़ती खुद से बतियाती मुस्कुराती खो जाती है खुद में ही कहीं
बिताती खुद के साथ कुछ समय वो ऐसे ही जैसे अज्ञातवास में हो आत्मा के साथ चिंतन के वो पल गुनते बुनते बहुत कुछ टूटता बिखरता जुड़ता आकार लेता उसके भीतर नया कुछ
और फिर लौट आते है कदम उसके दिवास्वप्न में डूबी तंद्रा के भंग होने पर जैसे भान होता यथार्थ के कठोर धरातल से टकराने का वैसे ही कदम उसके रिश्तों की डोर से बंधे लौट आते वापिस उसी राह पर जो राह जाती उसके जहान तक
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