Monday, June 19, 2017

रोना जिन्दा होने की है निशानी



सुना है
बचपन से रोना
है जिन्दा होने की निशानी,
बात है यह लौकिक
नहीं रूहानी
एक पुरुष को बचपन से
है सिखाया जाता
कि रोने वाले कमजोर है होते
चूंकि पुरुष कमजोर नहीं
बलवान है
स्त्री जननी है
सृष्टि की पोषक भी
लेकिन सृष्टि
पुरुष सत्ता के आगे
नतमस्तक है
और इसीलिए
रोना लिखा गया केवल
स्त्री की नियति में,
और तुम तो मर्द हो
मर्द कभी नहीं है रोते,
और देखा जाए तो
इस तरह
पुरुष के जिन्दा होने को
कर दिया जाता है खारिज़,
कि पुरुष बन जाता है कठोर
संवेदनाओं को उलीच देता है
मन के किसी कोटर में
और कर देता है चिन्हित
वहां निषेध,
कि रोता होगा मन उसका
कि होती होगी पीड़ा उसको
लेकिन आँखों में बाँध सीख के
रोक लेते सैलाब को
होती प्रतिध्वनित एक ही आवाज़
कानो में उसके
कि तुम मर्द हो
और मर्द कभी नहीं है रोते
और तब ढूंढता है
जीवंतता
उसका उद्वेलित मन
स्त्री के क्रंदन और चीत्कारों में..............

Friday, May 26, 2017

जंगलराज

सनद रहे
के आगाज़ हो गया है
हम जंगलराज में है
के टूट चुके है बाँध
मर्यादाओं सीमाओं के
के मर गया है आँख का पानी
के आदमी हो गया है भेड़िया
और मांस के लोथड़े
उनकी गंध बना रही है उसे
आदमखोर
और निशाने पर है
स्त्री 


उसका सौन्दर्य उसके शरीर के उभार
और उसकी योनी
जो सृष्टि की जननी कह
पूजी जाती थी
अब भड़काती है
इन्सान के भीतर छिपे जानवर को
वहशी आदमखोर हो जाने के लिए

कहते है
जीवन चक्र जब है घूमता
तो वक़्त स्वयं को है दोहराता
के आने वाला है
वहीँ पुरातन समय
जब स्त्री को
घर की चार दीवारी में कैद
कर दिया गया
के खीच दी गई
देहरी पर एक लक्ष्मण रेखा
इस ताकीद के साथ
लाघंना मत
इस रेखा को

के सीता को तो लक्ष्मण रेखा लांघने पर
मिला विरह अपमान अवसाद परित्याग
और धरती में समाने की सजा
दंड स्वरुप
लेकिन तुम्हे रेखा लांघते ही
निशाना हो जाना पड़ेगा
उन आदमखोरों का
जो लगाए बैठे है घात
तुम्हारे अस्तित्व को रौंद देने की
उनकी थोथी तुष्टि
मर्दानगी को सहलाती
तुम्हे मसलकर रौंदकर
लील जायेगी तुम्हारा स्त्रीत्व

और
यहीं नहीं होगा अंत तुम्हारे दंड का
के नोच फेंकेंगे वो
तुम्हारे उभार अपने नुकीले पैने दांतों से
और तुम्हारी योनी में
उड़ेल देंगे पिघलता हुआ लावा
तुम्हारी चीखो को
कर अनसुना निकाल फेंकेगे
तुम्हारी योनी को
और घोंप देंगे
तुम्हारी गर्दन में खंजर
ताकि तुम्हारी चीख
तोड़ देवे दम

तो ओढ़ लो घूंघट
के मत पड़ने दो
किसी की भी छाया अपने बदन पर
सिकोड़ लो खुद को
सिमट जाओ अपने दालान में
के आदमखोर शिकार पर है

और
इस तरह दे दो मुक्ति
माँ की उन दुश्चिंताओं को भी
जो बेटी के देर रात घर से बाहर रहने पर
घेर लेती उसके समस्त वजूद को
काले अंधियारे बादलों सी
वो अधीर हो मिलाती उसका फ़ोन
और फ़ोन न मिलने पर
भय से सिहर उठता है माँ का मन
के बेटी उसकी आदमखोरों के बीच अकेली है

के एक बार फेर
उस माँ की दुश्चिंताओं भय
खानदान की इज्ज़त और नाक
को बाँध दिया जाएगा
घर के आँगन में बंधे खूंटे से
यह बुदबुदाते हुए
सनद रहे
के आगाज़ हो गया है
हम जंगलराज में है
*************

Thursday, September 8, 2016

अबोल

कहना बेतरतीब सा, आक्रोशित सा, अवसाद में डूबा सा, या फिर सघन अंधियारों में बेतहाशा दौड़ता पसीने की दुर्गंध में सना, चीखने को आतुर लेकिन चीख उसकी गले में ही घुट दम तोड़ती, फिर भी आंखें कहने को लालायित और न कह पाने की पीड़ा पिघलकर आँखों में सागर के होने के भ्रम को कसकर पकडे कहती बहुत कुछ, जो अनकहा है जो अनबुझ है जो रहस्यों की भीनी सी चादर में सिमटा सा है, जिसे जानने समझने की जिज्ञासा और जिज्ञासु मन, कहना मनन चिंतन में बुनता कभी प्रश्नों को चंदा मामा में चरखा कातती बूढी अम्मा सा, कहना कई मर्तबे मन के सागर में डूबता उतरता सीप में पैठ जाता मोती सा, और फिर स्वप्न संसार में हो जीवंत पाने को राह मुखौटे ओढ़े बहुरूपिये सा करता अट्ठाहस, और फिर कहीं दूर सिसकियों के साथ तीव्र होता है एक विलाप जो कह जाता है बहुत कुछ...........कहना जब समझ से परे हो जाता है तब उसका हश्र या नियति कुछ ऐसी ही स्थिति की नज़र हो जाती है...........है न

Wednesday, May 25, 2016

लालबहादुर पुष्कर मीरापोर............एक मिसाल

नमस्कार मित्रों आज मैं आप सबको एक ऐसे व्यक्तित्व से मिलवा रही हूँ, जो हम सभी के लिए प्रेरणास्त्रोत है, लालबहादुर पुष्कर मीरापोर, मुझे याद है जनवरी २०१३ में मैं पहली बार लालबहादुर से मिली, लालबहादुर उस समय अन्तर्राष्ट्रीय अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी से रिसर्च स्टडी में अध्यनरत थे, एक दिन मैं अपने ऑफिस में बैठी थी, तो एक लड़का सकुचाता सा मेरे पास आया, उसने मुस्कुराकर मुझे अभिवादन करते हुए कहा मैडम मुझे मेरे मित्र मनीष ने आपके विषय में बताया कि आप कोई मासिक गोष्ठी करते है, और फिर बातचीत के दौरान उसने थोडा मुस्कुराते हुए कहा मैडम वैसे तो हिंदी मेरा विषय नहीं है, लेकिन मुझे कविताएं लिखने का शौक है, और अक्सर मैं कुछ नया लिखकर जब अपने मित्रों को सुनाता हूँ, तो वो कहते है अरे भाई क्या लिखे हो ? हमें तो कुछ समझ नहीं आ रहा है, तो मैडम आप एक बार मेरी कविताएं देखेंगी, मैंने तुरंत फेसबुक पर लालबहादुर की वाल देखी और यकीन जानिये जब मैंने उसकी कविताएं पढना शुरू किया तो मैं स्तब्ध रह गई, उसकी भाषा पर पकड़ और समाज के प्रति सोच इतनी विकसित थी, जो बड़े बड़े बुद्धिजीवियों में भी बहुत कम दिखाई पड़ती है, उसी समय ब्रिजेश जी एक साझा काव्य संग्रह पर काम कर रहे थे, मैंने उन्हें बताया लालबहादुर के विषय में और जब उन्होंने कविताएं पड़ी तो वह उसकी लेखनी से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाए, बोले लड़के में कुछ बात तो है, उसके बाद लालबहादुर से मैं निरंतर जुडी रही, उसने एसआईएस में एक काव्य गोष्टी “स्पर्शण” के नाम से शुरू की, जिसमे जेनयू के छात्रो को साहित्य की समस्त विधाओं से जोड़ने का प्रयास रहा उनका, मैंने उसी दौरान उसे हायकू के विषय में बताया और उसने हायकू के विषय में पढ़कर बहुत जल्द कुछ उम्दा हायकू लिखे, उसकी साहित्य के प्रति लगन व् ललक देख हमेशा मन खुश हुआ बहुत, एक छोटे भाई को इस तरह से आगे बढ़ते देखना सचमुच सुखद होता है बहुत, हमेशा कुछ नया सीखने की आग दिखी उसमे मुझे, और अभी लालबहादुर ने इसी साल में तीन बड़ी उपलब्धियां हासिल की, पहली २३ जनवरी को उन्हें साहित्य के क्षेत्र में युवा प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने हेतु “काका साहेब कालेलकर” सम्मान से “विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान और गाँधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा” के द्वारा सम्मानित किया गया, उसके बाद उनकी दूसरी उपलब्धि रही फरवरी माह में लोकसेवा आयोग उत्तर प्रदेश से मार्केटिंग इंस्पेक्टर के पद पर चयन हुआ, और अभी हाल ही में १० मई को निकले संघ लोकसेवा आयोग के अंतिम परिणाम में सिविल सर्विसेस में 771वा रेंक प्राप्त करना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि रही......इलाहाबाद के मीरापोर गाँव में रहने वाले लालबहादुर अपने परिवार में छः भाई बहनों में तीसरे नंबर की संतान है अपने माँ पिताजी की, उनके पिता श्री नेबूलाल पुष्कर अपने गाँव के इंटर कॉलेज में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी थे, जो वर्ष 2009 में सेवा निवृत हो गए, उनके पिता बहुत ही सहज सरल प्रवृति के मेहनती इंसान रहे, आज भी उनकी दिनचर्या सुबह चार बजे से शुरू होती है, स्नान ध्यान के बाद वह चिड़ियों को भोजन कराने और बच्चों को प्रसाद बांटने के पश्चात् आसपास के लोगो की समस्याओं को सुनते और उनकी मदद करने का हर संभव प्रयास करते है, उनकी माताजी कलावती देवी, एक संस्कारी घरेलू महिला है, जिन्होंने घरद्वार की समस्त जिम्मेदारियों को सदा दिल से निभाया, उनके बड़े भैया भाभी, लालबहादुर उन्हें अपना दूसरा माता पिताजी कहते है, उन्होंने उनका सदा बहुत साथ दिया और वहीँ उनके प्रेरणास्त्रोत भी रहे है जीवन में, आज लालबहादुर जो कुछ भी है उसका पूरा श्रेय वह अपने भैया भाभी, माता पिताजी और गाँव के लोगो को देते है, लालबहादुर ने बचपन से ही बहुत मेहनत की, जब वह कक्षा चार में पढ़ते थे, तभी से वह अपनी पान और फूलों की दूकान संभालते थे, अपनी पढाई के साथ, वो मुस्कुराते हुए कहते है, मैंने बचपन से किसी काम को छोटा या बड़ा नहीं समझा वो कहते है मुझे याद है हमारे यहां हर मंगलवार और शुक्रवार को हाट लगती थी, और मेरी दादी पान के बीड़े बनाकर एक डलिया में रख देती थी मैं पूरे बाज़ार में सबको पान बीड़ी देकर आता था, उन्होंने बताया कि मैंने अपने पिता से कभी आर्थिक मदद नहीं ली, जब तक मैं घर पर रहा अपनी स्कूल की पढ़ाई के दौरान, शुरू से ही अपने खर्चे खुद वहन किये, दिल्ली में पढाई करते हुए भी लालबहादुर अपने गाँव अपनी मिट्टी को नहीं भूले उन्होंने अपने गाँव में प्रथम पुस्तकालय “जन पुस्तकालय” खोला जहाँ पर गाँव के सभी लोग आकर पुस्तके पड़ सके, इस पुस्तकालय के लिए उन्होंने कहीं से अनुदान नहीं लिया बल्कि उन्हें मिलने वाले छात्रवृति के पैसो का उपयोग उन्होंने इस पुस्तकालय के लिए किया, आज उनके इस पुस्तकालय में केवल गाँव भर के ही नहीं अपितु आसपास के गाँव के लोग भी पढने आते है, उनके इस पुस्तकालय में दो बड़े समाचार पत्र आते है, और कई नियमित पाठक भी है उनके पुस्तकालय के, इस पुस्तकालय को गाँव के सभी लोग सामूहिक रूप से चला रहे है उनकी अनुपस्थिति में भी, आज भी लालबहादुर एक सम्मानित पद पाने के बावजूद उसी सरलता सहजता से बंधे हुए है हम सभी से जबकि अक्सर लोग थोड़ी सी उपलब्धि पाते ही बदल जाते है यहाँ......उनकी निष्ठां लग्न ईमानदारी सहजता सरलता और जमीं से जुड़े रहने की ललक ही है जो उन्हें औरों से अलग बनाती है, आज भी सबकी मदद करने को वो हमेशा तैयार दीखते है, मुस्कुराते हुए उन्होंने अपनी कविता के माध्यम से अपने मन को उकेरा है तो उसे मैं साझा कर रही हूँ यहाँ........
अंधेरे में लोग बेख़ौफ़ चल सकें
इसलिए
सस्ती दरों से


मैं चराग़ बेचना चाहता हूँ..............मेरी कलम से

Friday, April 1, 2016

समर्पण शेष कहा स्वीकार करता है

पागल सी मैं कहती हूँ कुछ भी कहती हर पल कभी तुमसे कभी खुद से कहना मेरा ब्रह्माण्ड में विचरते शब्दों सा भावो की बारिश सा कही अनकही अपनी ही बाते कभी रीते घड़े सा मन के किसी कोने में पाता पनाह और जो रह जाता अनकहा शेष वो दीखता है मुस्कराता हुआ तुम्हारी आँखों में खोकर पाने की चाह झलकती है उन सच्ची बातो में शेष फिर शेष नही रहता
समर्पण शेष कहा स्वीकार करता है
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Wednesday, February 10, 2016

प्रेम

नमस्कार मित्रों फ़रवरी माह के आते ही हर मन कहता है थोडा सा रूमानी हो जाए.........संत वलेंटाइन ने भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन प्रेम का स्वरुप इस तरह से सामने आएगा......हर मन कुछ दिन सब भूल रूमानी होने को आतुर हो जाएगा........प्यार एक अनुभूति एक पुरसुकून सा एहसास है जिसे हर मन अपने अनुसार परिभाषित करता है......और प्रेम मुस्कुराता है क्युकि वो सब परिभाषाओं से परे है......

अमृता के लिए इमरोज़ का प्रेम ऐसा प्रेम रहा है जिसने मुझे अंतस से छुआ, लेकिन जब पढ़ा कहीं कि इमरोज़ एक बार अमृता से नाराज़ हुए तो दो साल तक दूर रहे, तब मन में एक बेचैनी ने जन्म लिया क्या जिसे हम खुद से ज्यादा प्यार करे उससे दूर रहा जा सकता है ? कहते है प्यार है एक दुसरे को पूरी तरह समझना, लेकिन क्या हम तमाम जिंदगी खुद के साथ रहते हुए भी स्वयं को समझ पाते है ? आत्मबोध होना तो मोक्ष की निशानी होता है न ? और मोक्ष पा साधक हो जाना हर किसी के वश की बात कहाँ ? 

किसी को समझ पाने के लिए सात जन्म भी कम होते है, मुझे अक्सर ऐसा लगता है, इंसानी फितरत और स्वभाव अक्सर परिस्तिथियों की नज़र हो जाता है, इंसान कभी अच्छा बुरा नहीं होता केवल परिस्थितियां अच्छी या बुरी होती है और बेक़सूर सा जीव चढ़ जाता उनकी भेंट......खैर हम आते है प्रेम पर.....तो प्रेम में अलगाव क्या प्रेम का ही स्वरुप ? और लोग कहते है प्रेम वहीँ जो पूर्ण नहीं हुआ....हाँ याद भी तो उन्ही के प्रेम को करते है लोग जो मिल न सके बाकी जिन्होंने अपने प्रेम को पा लिया उनका प्रेम तो चूल्हे चौके की नज़र हो और निन्यानवे के फेर में पड़ जाने कहाँ खो गया.....प्रेम में होना एक तरह का जूनून होता है, केवल वहीँ दीखता सोच में विचारों में ख्यालों में हर तरफ सिर्फ वहीँ, गर ऐसा प्रेम इष्ट से हो जावे तो कहना ही क्या सूफियाना सा हो जाए आलम....लेकिन प्रेम पा लेने की प्यास को करता पोषित.....विरह अग्नि उसे कम नहीं होने देती जरा भी.....अग्नि की तपिश प्यास को बढ़ाती....

जब हर तरफ वहीँ दिखता उसी को सर्वस्व समझ मन उसके इर्दगिर्द ही जीवन बुन लेता तब आपेक्षाये है जन्मती.....और प्रेम का आलिंगन है करती प्रेम उस घेरे में सिमट जाता, और इस तरह प्रेम का दम घुटने लगता, वो छटपटाता उस कसते हुए घेरे में और फिर शिथिल पड़ने लगता है....आपेक्षाये विचलित हो अपना घेरा है कसती, विकल सी खो देने की आकांशा.....क्युकी प्रेम के अतिरिक्त तो कुछ और ध्येय रहा ही नहीं....तो लगता सब खत्म हुआ....

शायद भूल जाता बावरा सा मन कि अंत शुरुवात की और देखता है, और जहाँ एक राह बंद है हो जाती तो खुलती है राह कई....यहाँ बात विकल्पों की नहीं कि एक हाथ छूटा तो दूजा पकड़ लो यहाँ बात है अपने अंतस को टटोलने की राह तय करनी अपने भीतर खोजना मार्ग और जीवन ध्येय भी....प्रेम का विस्तार करना यानी प्रेम को ढूंढना हर कण में फिर पा जाने को कुछ नहीं रह जाएगा शेष.....और अतृप्त प्यास से मिलेगी मुक्ति.....और फिर विश्वास जो जीवन का आधार है उसका क्या ? गर प्रेम पर अटूट विश्वास तो प्रेम कहीं नहीं जाता वो घूमफिर भटक भटका कर लौट आता वहीँ जहाँ जिस मोड़ पर आपको छोड़ गया था खड़ा.....क्युकी वो प्रेम है छलावा नहीं.....मैं प्रेम को इस तरह और इतना ही समझ पाई.....बाकी आप बताये आपने प्रेम को कैसे कितना और किस तरह जाना समझा ?.....बाकी चलते चलते निदा साहब का एक शेर याद आ गया आपकी नज़र...
हर आदमी में होते है दस बीस आदमी, जब जिसे देखना, कई बार देखना।

Thursday, December 17, 2015

सुप्त आत्माओं को झकझोरने का प्रयास करती खरी खरी

जब तक अपने धोती में आग नहीं लगती तब तक इंसान रूपी जीव की आत्मा सुप्त रहती है, मूकदर्शक तमाशबीन सी हाँ दूजे की आग हाथ तापने के लिए एकदम उत्तम बोले तो सेहत के लिए मन के लिए स्वास्थ्यवर्धक सी......उदासीन आपाधापी सी जिन्दगी में कुछ तो रंगबाजी चाहिए न ......बोले तो थोडा सा मसाला वर्ना जिन्दगी बेस्वाद सी है साला......तभी तो बलात्कार जैसे घिनौने कृत्य के बाद जागृत हुई चेतना जाने शब्दों से और कितनी बार करती चीरहरण उस मासूम का और उसके जख्मों को नाखूनों से कुरेदती तब तक जब तक उनमे से लहूँ न रिसने लगे........गर ये चेतना घटना के घटित होते समय जागृत हो आक्रोशित हो थोड़ी सी मर्दानगी थोड़ी सी जिन्दादिली थोड़ी सी हिम्मत के साथ तो शायद ऐसी घटनाएं न हो......बाद में पीड़िता को, कानून को, सरकार को, पुलिस को, कटघरे में खड़ा करने से बेहतर है घटनास्थल पर गर आप मौजूद है तो बस एक आवाज़ उठाये, कुछ दुखद घट जाने के बाद मोमबत्ती जलाने से बेहतर है घटना के समय एक अलख जगाये.........क्यूकि वहां मौजूद हर शख्स है जानता जो हो रहा वो गलत है, लेकिन सब पहल होने का इंतज़ार है करते........कि कहीं से कोई माँ का लाल जो वास्तव में मर्द हो आवाज़ उठाये....यक़ीनन जहाँ चंद आवाज़ उठेंगी वहां एक सैलाब उठेगा......कुछ दिनों पहले मेट्रो में यात्रा के दौरान मैं जल्दबाजी में पुरुष डिब्बे में दाखिल हुई, तो वहां पहले से ही यात्रा कर रहे कुछ लड़के माँ बहन की भद्दी गालियों के साथ बात कर रहे थे, मेरे चढ़ते ही एक लड़की जो पहले से बैठी थी मेट्रो में अचानक बोलने लगी कि आप लोग इतनी देर से गालियों के साथ बात कर रहे है, आपको इतना तो भान होना चाहिए की सार्वजनिक स्थल पर जहाँ महिलाए भी है आप अपनी भाषा मर्यादित रखे......तो उनमे से एक लड़का अकडकर बोला तुम्हे क्या दिक्कत है ? हम आपस में कैसे चाहे बात करे, गर इतनी ही दिक्कत है तो मैडम अपनी गाडी से चलना शुरू कर दो और उसके इतना कहते ही आसपास खड़े कई पुरुष ठठाकर हस दिए......मैंने बिना पीछे मुड़े तेज़ आवाज़ में इतना कहा तुम लोगो को शर्म आनी चाहिए एक तो गलत बात कर रहे ऊपर से ढिटाई इतनी की अकड़ रहे हो........वो लड़का हडबडा गया और उसका स्वर बदल गया बोला मैडम वो बातचीत में एक दो बार कुछ शब्द निकल गए होंगे.......तो वह लड़की बोली झूट मत बोलो इतनी देर से लगातार तुम लोग माँ बहन को इज्ज़त बक्श रहे हो......मुझे एक बात समझ नहीं आती जहाँ एक ओर अपनी माँ बहन को जरा कुछ कह देने पर इनकी मर्दानगी जाग उठती है और ये तीर तलवार लेकर खड़े हो जाते शूरवीरों से वहीँ दूसरी ओर बात बात पर माँ बहन की गाली देकर क्या जताना चाहते है? या तो इनकी माँ बहनों के पास वो विशिष्ट अंग होते नहीं जो एक स्त्री को पूर्णता प्रदान करते है या ये जीव कर्ण या पांड्वो की तरह ईश्वर की डायरेक्ट देन..........इसीलिए जिज्ञासावश ये जीव इस तरह से माँ बहनों को इज्ज़त बक्शते.....लेकिन एक बात और अरे बई स्त्रियाँ तो हमेशा से अबला कमजोर रही है तो क्यूँ उनकी शान में कसीदे पढ़ते हो ? थोड़ी इज्ज़त पुरुषों भी बक्श दो दो चार गालियाँ उनकी शान में भी देकर दिखाओ तो जाने कि आपके जिगर, फेफड़ों और गुर्दों में दम है.......लो जी बावरा मन गालियों के संसार में भटक गया खैर आते है मुद्दे पर हम......बस जी उस लड़के की आवाज़ थोडा सा लडखडा गई, और उसके बाद कई शब्द मुखर हो उठे, कुछ युवाओं के खून में उबाल आया तो कुछ बुजुर्गों ने भी उनकी भर्त्सना की, एक आवाज़ जहाँ बुलंद हुई अनेक स्वरों को हौसला मिला और कई स्वर उठे गलत के खिलाफ..........तो साहब बात बस इतनी सी है पुलिस को सरकार को या दरिंदों को कोसने से कुछ नहीं होने जाने वाला.....जरूरत है आज समय पर आवाज़ उठाने वाले शूरवीरों की (इसमें केवल पुरुष ही नहीं महिलायें भी स्वयं को शामिल समझे ).........और हाँ एक नेक सलाह..........कागजी शेर जो संवादों से ही कर्तव्य निर्वाह कर लेते वो कुछ गालियाँ भाइयों पिताओं की शान में गढ़ इतिहास रचे........दिल्ली के सर्द माहौल से सर्द होते लोगो के जज्बों को चिंगारी दिखाती खरी खरी के साथ खुराफ़ाती किरण आर्य अपने तीखे से कलेवर में

Thursday, September 24, 2015

खरी खरी (फेसबुक पर डिसलाइक का तड़का)

नमस्कार मित्रो अभी कुछ दिन से लगातार चर्चा में कि फेसबुक पर जल्द ही डिसलाइक का बटन आ रहा है, सुनकर ही दिल डूबने सा लगा सच्च.....अरे घबराए नहीं विचारों के समुन्द्र में जी.....पहले ये होता था कि आपको जो पसंद नहीं आप उसकी पोस्ट पर नहीं झांकेंगे न पढेंगे न कोई टंटा एक मौन सहमती कि आपको मैं पसंद नहीं, तो आप देखे नहीं मैंने क्या लिखा और मुझे आप पसंद न तो मैं आपकी तरफ पीठ भी काहे करू ? यानी शीत युद्ध चलता था.....लेकिन अभी तो शीत युद्ध जैसी पुरातन प्रथा को नेस्तानाबूद करने की तैयारी जी.......हम अपने संस्कारों और प्रथाओं के नाम पर बहुत सी सही और बहुत सी गलत प्रथाओं का निर्वाह आँख मूंदकर करते आये है, और चाहते हमारी भावी पीड़ियाँ भी गलत सही के फेर में पड़े बगैर उनका अँधा अनुकरण करती चले....खैर ये बावरा मन भी न.....भटकन इसकी क्या कहे प्रथाओं के चक्कर में भटक लिया....तो हम आते है मुद्दे पर....अब होगा ये कि जिससे आपकी जरा भी खुडक हो सीधा जाके पोस्ट पर उसकी डिसलाइक का बटन दबा उसको ये बता देने का कि भैये तुम्हारा लेखन एकदम दो कौड़ी का है, और गर आप गुटबाजी के समर्थक तो भाईचारे का निर्वाह करते अपने बंधुवरो के माध्यम से डिसलाइक करा करा बन्दे को अवसाद के गर्त में पंहुचा देने का, ताकि बन्दा लेखन से तौबा कर ले, और फ़तवा जारी कर दे कि मेरी आने वाली सात पुस्त में कोई लिखने का सोचेगा भी नहीं.......हाँ हम जैसे कुछ चिकने घडो की बात अलग है, हमें तो कोई डिसलाइक करे तो हम उसका तहेदिल से शुक्रिया अदा करेंगे, क्युकी उनके डिसलाइक की वजह से लोगो में जिज्ञासा उत्पन्न होगी की भईये आखिर लिखने वाले ने ऐसा क्या लिखा कि इत्ते महानुभाव उसे नापसंद कर रहे है ? उससे होगा ये कि हमारी बात अधिक लोगो तक पहुचेगी, पाठकों की संख्या बढ़ना यानी लिखना सार्थक हो जाता.......और नापसंद करने वालो में कुछ मशहूर तथाकथित अच्छे लेखक हो तो पूछिये मत आपकी तो किस्मत ही चमक गई साहब........खैर ये तो है मेरे बावरे से मन की बात आपकी आप सोचिये जनाब..........दिल्ली से खरी खरी के साथ खुराफाती किरण आर्य

खरी खरी (कुंठित मानसिकता)

नमस्कार मित्रो आज दिमागी कीड़े तनिक बौखलाए हुए है.......छत्तीसगढ़ बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन की ओर से छपने वाली एक किताब में महिलाओं के कामकाजी होने को बढ़ती बेरोजगारी का दोषी बताया गया है. देश की आर्थिक समस्याएं और चुनौतियां वाले चैप्टर में यह कहा गया है कि आजादी के बाद देश में बेरोजगारी इसलिए बढ़ी, क्योंकि हर सेक्टर में महिलाओं ने काम करना शुरू कर दिया है.....यानी महिलाओं का काम करना गुनाह हो गया, जाने क्यों महिलाओं को अक्सर सहजता से कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है ? शायद ये रीत हो गई है, यहीं तो होता आया है सदियों से.....देश को आज़ाद हुए इतना समय हुआ लेकिन ससुरी मानसिकता अभी भी गुलाम ही रह गई, कहते है जीवन परिवर्तनशील है रुत बद्लती है, मौसम बदल जाते है, सदिया है बीतती और युग बदल जाते है, फिर मानसिकता काहे आज भी वहीँ बंधी एक खूटे से अंगद के पाँव सी....आज हम आधुनिक होने का दम भरते है, फिर मानसिकता आज भी क्यों स्त्री को लेकर कुंठित सी है ? ये कटु सत्य है जो अपच का कारण हो सकता है.....मानती हूँ परिवर्तन की गति धीमी होती है.....लेकिन एक विशेष वर्ग की बात छोड़ दे तो माध्यम वर्गीय स्त्रियाँ आज भी इस पीड़ा से मुक्ति राह खोजने में लीन है, क्या करे समाज परिवार की इज्ज़त उनके कंधो पर जो टिकी है......यहाँ दोषी केवल एक कुंठित मानसिकता है कोई वर्ग विशेष नहीं, और कुंठा से कोई भी ग्रसित हो सकता है.......ये ध्यान रहे.......दिल्ली से खरी खरी के साथ खुराफाती किरण आर्य

Friday, September 18, 2015

खरी खरी (दिल का दर्द)

हर बावरी है कहती पति परमेश्वर मेरा स्वामी मेरा प्राण प्यारा, जब ईश्वर का दर्जा दे ही दिया मान ही लिया उसे स्वामी तो फिर वो दिखाए स्वामित्व प्रभुत्व तो काहे महिला सशक्तिकरण का झंडा उठा चिल्लाना जी ? मानसिकता गुलाम प्रवृति को सर माथे लगा ही चुकी है, सदियों से चली आ रही प्रथा लड़की जरा बड़ी हुई नहीं संस्कारों इज्ज़त की बेड़ियाँ पहन पाँव में नाचती ख़ुशी ख़ुशी.......ऐसे मत चलो ऐसे मत हंसो ऊंची आवाज़ में मत बोलो सलीके से रहो......और सबसे बड़ी बात कि अभी बिटिया बड़ी हो रही तो घर के काम काज रसोई बनाना सिखाओ ताकि दूजे घर जाके गाली सुनने को न मिले.......चाहे लड़की जिला क्लेक्टर हो या मंत्री संत्री लेकिन खाना बनाना घर में उसकी जिम्मेदारी, बच्चे कुछ अच्छा कर जावे तो पिता की छाती चौड़ी और जरा गलत चले तो तुम जरा सा बच्चो को भी नहीं संभाल सकती हो ? कमजोर अबला कहलाती और ऑफिस से आके खाना बनाने से लेकर सारी जिम्मेदारी उसके ही सर, गजब बात है ना प्रबल कहलाने वाला पुरुष ऑफिस से आके टीवी देखता खाना खाता और फिर थककर सो जाता और कमजोर महिला ऑफिस से आ बच्चो को देखती खाना बनाती रसोई बना किचेन साफ़ कर सोती सुबह की सब व्यवस्था निपटाकर.....हास्यपद लगता सच बहुत......कल बेटी बोली मम्मा आज टीचर पढ़ा रही थी तो विषय के बीच में आया कि पैर चौड़े कर खड़े होना स्त्री का बुरा क्यों समझा जाता है? बोली मैंने तुरंत कहा मेम ये माना जाता है जो स्त्री पैर चौड़े कर खड़ी होती है वो चरित्रहीन होती है तो उसकी मैडम ने हँसते हुए कहा जानती हो वास्तव में पैर चौड़े कर खड़ा होना आत्मविश्वास की निशानी होती है, लेकिन इसे स्त्री के चरित्र से इसीलिए जोड़ दिया गया ताकि स्त्रियाँ पैर चौड़े कर खड़ी न हो पावे........सुनकर सोच में पड़ गई मैं ? फिर लगा इसमें सोचना कैसा रे यहीं तो होता आता है, अरे तू लड़का है घर का काम बहन को करने दे, लड़के रोते नहीं है, बस रुलाते है ....और लड़की लेकर भाग गया या प्रेम कर बैठा तो कोई नहीं इस उम्र में करते ऐसे कर्म लड़के.....ओह्ह्ह शराब पीने लगा है, या रात की पार्टियों में जाता है, लड़का जवान हो गया है.......दोहरी मानसिकता पुरुष करे तो जायज़ और स्त्री करे तो पाप महापाप.....और कह दो आप तो निरी स्त्रीवादी......यानी कहना भी गुनाह........सहो सहो और चुप रहो यहीं नियति तुम्हारी....स्त्री पुरुष एक ही रथ के दो पहिये है, एक दूजे बिन अधूरे एक दूसरें के पूरक फिर काहे नहीं बराबर ? समाज ने दिया ये ढांचा हमारी पुरातन परम्पराओं से चलता आ रहा ये तो.....यहीं कहेंगे न आप.......अरे बई क्यूँ नहीं इस ढर्रे को बदला जा सकता आखिर समाज हमसे ही बना है न? जब संसार परिवर्तनशील है, तो यहाँ आके क्यों सोच गच्चा खा जाती जी ?.........आज की बात करे तो कुछ पढ़े लिखे दम्पतियों में जो दोनों ही काम करते बाहर जाके घर से बदलाव आया है, वो समझते है स्त्री भी उनकी तरह इंसान हाड मॉस का पुतला है, तो देते साथ समझती उसकी भावनाओं को......जो करते ऐसा वो मासूम बेक़सूर समझे खुद को मेरे कटघरे से बाहर खड़ा........और सही मायनों में कहूँ तो स्त्री जहाँ खड़ी उसके लिए उसकी जिम्मेदारी भागीदारी अधिक है, वो नियति मान बैठी इसे खुद की, महान कहलाने की चाह बड़ी आखिर........सहनशील, त्याग की मूर्ति, प्रेमी ह्रदय कहलाने का मोह जाने कब छोड़ेगा पीछा उसका जाने कब ?........दिल्ली से दिल के दर्द का वमन करती खरी खरी के साथ खुराफाती किरण आर्य

Thursday, September 17, 2015

दुनियावी कोहराम

साहित्यकार रंगनाथ मिश्र चाहे उस कहावत को चरितार्थ करने हेतु झुके हो, कि फलदार वृक्ष ही है झुकते, और इसमें उनकी सहजता या सरलता या भाव नहीं देखा लोगो ने बस ऊ गाना है ना के "कुछ तो लोग कहेंगे लोगो का काम है कहना" बस आँख मींच उसका अनुसरण करने लगे......जान ले ली है बन्दे की.....झुकना घोर अपराध हो गया हो जैसे, इस देश में एक बच्ची के साथ बलात्कार कर कुकर्मी बेशर्मी से सीना तान दांत निपोरता है उसका कुछ नहीं एक सज्जन पुरुष कदमो में झुक लिए उसका बवाल मचा दिए हद है जी......अरे भाई अंधभक्ति भक्तिभाव भी कोई चीज़ होती है.......भाव विभोर हो झुक गए तो क्या हुआ जी ?.....दुनिया झुकती है, सफलता के समक्ष तो सूरज और चाँद भी शीश नवाते जी......अब रंगनाथ जी को अखिलेश यादव में कृष्णा दिख गए और वो भावुकिया गए तो क्या बुरा जी ? सगरा साहित्य जगत मिडिया जगत सक्रीय हो उठा इस महापाप के लिए मिश्र जी को गरियाने को.......कोई साहित्यकार अपनी गरिमा का भान कर सीधे मूह बात न करे तो लोग कहते साहित्य विनम्र बनाता ये कैसे साहित्यकार भला ? जो विनम्र होकर झुक गया वो महापापी हुआ......साहित्य का नाम कलंकित करने वाला......अरे भाई जमाने का चलन यहीं कि चापलूसी और मक्खन लगाने की कला में जो माहिर वो सफल भी और बड़ा भी......तो गर ये अपना लिए उसे तो क्यों इत्ता हल्ला जी?.......जी हजुरी करके कितने ही यहाँ महान हुए, सो फिर एक और इस श्रेणी में हुए शामिल तो क्यों गिला ?.........दिल्ली से दुनियावी कोहराम पर मुस्कुराती खरी खरी के साथ खुराफाती किरण आर्य.......:)

Wednesday, September 16, 2015

बावरी जनता

मुझे इत्ती सी बात समझ न आती है ये अनाड़ी जनता मूढमति सी....... चाहे वो प्राकृतिक आपदा हो, मानव निर्मित आपदा हो या फिर उसकी अपनी परेशानी....जिसमे बेरोजगारी महंगाई स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ सब निहित है......सभी आपदाओं के लिए मासूम नेताओं को काहे कटघरे में खड़ा कर देती है?......अब डेंगू का मच्छर उनसे पूछकर तो नहीं काटता न या उसके जन्म लेने में इनका कोई हाथ हो ऐसा भी नहीं......वो तो स्वत पैदा हो जाता है......और अस्पतालों में इत्ते मरीज है कि जगह नहीं अब उसके लिए भी नेता सरकार दोषी काहे भाई काहे ? कोई भी आमिर इंसान या नेता मरा अभी तक डेंगू या फ्लू से नहीं न, अरे बई ये उनकी सजगता और प्रीकाउसन का कमाल है......हर बात के लिए उन्हें संदेह दृष्टि से न देखे प्लीज, डेंगू मच्छर उनका रिश्तेदार नहीं है जी, या उनके प्रति उसका विशेष नेह अनुराग भी न है.......देश के उत्थान के लिए प्रधानमंत्री विदेशो के साथ अच्छे संबंध बनाने हेतु जुटे हुए पूरी कर्मठता से.....ऐसे में इन छोटी मोटी घरेलु विपदाओं के लिए उन्हें कसूरवार ठहरा उनका ध्यान भंग करना उनकी तपस्या में रूकावट की साजिश है.....अरे भैये वो दिन गए जब ये कहावत चरितार्थ होती थी कि पहले घर सबल होना चाहिए.....आज तो देश के चहुमुखी विकास के लिए ये आवश्यक है कि .....देश में चाहे रोज़ कितने ही बलात्कार हो रहे हो रोज कानून को ताक पर रखकर या सरकारी नौकरी की जगह ठेकेदारी प्रथा चलन में आ रही हो या प्याज की मार से आम आदमी जार जार रोये या डेंगू मलेरिया की वजह से आम जन मर रहा तिल तिल.....उसको दरकिनार कर बस विदेशो के साथ अच्छे संबंध स्थापित हो......कब खुलेगी जनता की आंखें कब नेताओं के सरकार के सुकर्मों को समझने की कूवत अता करेगा इन्हें ईश्वर जाने कब..........जनता की मंदबुद्धि और जाहिलपने पर अफ़सोस करती.........दिल्ली से खरी खरी के साथ खुराफाती किरण आर्य

Friday, September 4, 2015

मन भ्रम

नमस्कार मित्रो आज दिमागी कीड़े कुछ दार्शनिक मूड में.........कहने को आतुर अपनी बात.........समझिएगा और पहुचे वहां जहाँ है राह तो अवगत जरुर करियेगा........

मन का भ्रम
इच्छाओं की
अदृश्य डोरी पकडे
गलतफहमियों के
सघन गलियारे में
निरंतर है दौड़ता
राह
अबूझ पहेली सी
अन्धकार घोर अन्धकार
संकरी सी एक गली
जो मुहाने पर आ
हो जाती बंद
उस पल मन का हाहाकार
हो प्रबल है चीत्कारता
लेकिन गूँज उसकी
प्रतिध्वनित हो लौट आती
टकराती है उसके अंतस से
बेचैनी दौडती
लहू की जगह नसों में उसकी
और फिर दौड़ जाता वो
नई तलाश से बंधा
तलाश नए भ्रम की
जो उसके चिर भ्रम को
तृप्ति दे
गतिहीन सा मन
एक तीखी सी बू
नथुनों से टकराती
सीली सी चाहतों की
साँसे बोझिल सी
पैर लहुलुहान थकान से चूर
फिर भी दौड़ता जाता
सांस की अंतिम छोर की तलाश में
बावरा सा मन.......और हाथ आती सिर्फ भटकन और अतृप्त सी प्यास......नयनों में नीर भरे.................है न

Tuesday, August 25, 2015

देह मिटटी साधो

ओह्ह्ह ये देह तो मिटटी साधो
और जाना शाश्वत है
आगमन के उत्सव सा ही.......

मौत कभी उत्सव का वरण नहीं करती,
मृत्यु शाश्वती आवरण
ओढ़े इठलाती है,
उसकी आहट मन को करती उद्वेलित,
कर्म निवृति की राह में
अंतिम ध्येय सी मौत,

करती अठ्ठास
सत्य है मौत,
लेकिन सत्य का नर्तन होता नग्न
शायद इसीलिए
सत्य से रूबरू होने को उत्सुक मन
उसके समक्ष
आंखें मूँद है लेता

जी हाँ बिलकुल
कबूतर के बिल्ली के समक्ष आंखें मूंदने जैसे ही,
बुरे कर्म भी मौत का आलिंगन करते ही
परिवर्तित हो जाते है सत्कर्मो में,
आश्चर्य है ना ?

रीत यहीं जाने वाला चाहे महाचिरकूट हो
या बड़े वाला बीप बीप
लेकिन जाने के बाद उसको गरियाना
जाने क्यों अपशगुन सा समझा है जाता ?

रुखसती के साथ ही प्रलाप शुरू होता है,
और सब चाहे जीते जी कहते रहे हो
साले के कीड़े पड़े,
लेकिन मरते ही उसकी
आत्मा की शांति के लिए प्रार्थनाये चालु होती,
मृतक के स्वर्गवासी होने की पुष्टि की जाती
उसके नाम के साथ स्वर्गीय लगा,

चाहे जीते जी वो बना गया
जाने कितनो का जीवन नरक सा
जाने वाली आत्मा परमात्मा में होती विलीन
या ओढ़ दूजा चोला
कर्म और संस्कारों के निर्वाह को होती उद्दत
ये निर्भर करता नियति पर उसकी
और नियति को नियत करते संस्कार ही
संस्कारो का फेरा और जीवन कर्म का डेरा
बस यहीं है अंतिम सत्य जिससे बंधा
जीवन मृत्यु का कर्म
और ये बावरा सा जीवन
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