Tuesday, September 4, 2012

प्रेम डगर

प्रेम डगर कांटो से भरी हाँ संकरी बड़ी
हर कदम संभलना और चलना
हाँ जो जान गया इसकी रीत
वो आंखें बंद कर भी चलता गया
बिना गिरे डगमगाए
इसमें बस समाये एक ही भाव
समर्पण संग विश्वास
प्रेम डगर कांटो से भरी हाँ संकरी बड़ी
हाँ है एकतरफा भी
चल पड़ा जो इसपर
उसको निकलने की राह नहीं
या तो राही हो गया
या फिर मृगतृष्णा सी भटकन
उसकी झोली में आ गिरी
प्रेम डगर कांटो से भरी हाँ संकरी बड़ी
है जीवन निहित इसमें
तो समाई काँटों की चुभन भी
खुशियों की राहगुजर सी
तो आसुओं का सबब कभी
लेकिन जिसने पा लिया मीरा सा भाव
उसको ही है मंजिल मिली
प्रेम डगर कांटो से भरी हाँ संकरी बड़ी..........किरण आर्य
माया मृग जी की पंक्तियों से प्रेरित.........(प्रेम गली सिर्फ संकरी नहीं, इकतरफा भी है.)

मासूम जिंदगी




यथार्थ के कठोर धरातल से टकराकर 
मासूम जिंदगी सिसकती क्यों है.....
शायद आदत में शुमार नहीं था उसकी
हवा के विपरीत चलने पे संभलना.... 

इसीलिए तो रूह उसकी हो रक्तरंजित
पाने को वजूद भटकती यूँ है.....
गर लड़ना है आँधियों से उसे
तो खुद ही संभलना होगा.........
चलना होगा निरंतर एक नई आस संग
और देंगे होंगे मायने खुद को खुद ही..............किरण

 

कहानी




कहानी.....हाँ जीवन एक कहानी ही तो है
कभी मेरी - कभी तुम्हारी कहानी
जो गढ़ी हमने.....
हाँ, कहानी लिखी कहाँ जाती है
वो तो खुद ब खुद बन जाती है,
जो अनुभवों से रची जाती है
उम्र के हर पड़ाव संग कहानी
नित नए रंगों में ढलती है
हाँ देखो कैसे - कैसे रूप बदलती है;.......
कभी नितांत अपनी - तो कभी लगती बेगानी है
कहानी.....हाँ कहानी ये कुछ तेरी - कुछ मेरी
कुछ जानी कुछ अनजानी है......
कितने ही हिस्सों में बंट गई ये और
इस संग टुकडो में बंट गया फिर जीवन,
आज उम्र के एक पड़ाव पर आकर
जब कुछ फुरसत मिली तो आज
उसे फिर सहेजने को मन हुआ,
और जीवन के उन टुकडो में जिंदगी को
कभी हँसते - कभी रोते पाया
कभी खुद को हारते तो कभी
जीवन समर में गिरकर संभलते पाया....
सभी रसों का समावेश मिला उसमे
और तब जाके ये समझ आया
कि ऐसे ही तो नहीं कहते कि
जीवन राह है बड़ी दुर्गम
हौसला है संग तो है सहज भी
वर्ना तो यहाँ लोगो को
बैसाखियों पर ताउम्र चलते पाया.......किरण आर्य