Thursday, September 20, 2012

सभ्य हम

कुछ आँखे पथराई हुई सी बेबसी से तरसती हुई,
बस बरबस गगन को निहारती हुई निरंतर,
कड़ाके की सर्दी खून को सर्द करती हुई,
उनके तन को नही मन को भी अंदर तक सालती हुई,
अब तो आँसू भी नही बहते आँखो से उनकी,
कोर भी सूख गये है उनके सूखे हुए सोतो की तरह,
ठंड से सिकुड़ते बच्चे उनके कड़कड़ाते हुए,
अब तो रुदन भी उनका हलक से निकलता नही,
कहीं अंदर ही मर रहा है हर पल प्रतिपल,
अपने फटे आँचल से ढाकती उनका सिकुदा बदन,
सोच रही है बेबस माँ इस झीने आँचल मे मेरे,
क्या पता अभी भी गर्मी कुछ बाकी हो,
जो मिटा दे उसके बच्चो की तृष्णा और ठंड,
जो दे उन्हे कुछ गर्माहट भरे प्यारे पल,
हम अपने घर मे रज़ाई मे बैठे गर्म पलो का आनंद लेते,
ब्लोअर से गर्म हुए कमरे मे भी सर्दी को कोस रहे है,
हममे से कितने है जो इनके विषय मे भी सोच रहे है?
क्या इतने सबल भी नही है हम जो दूसरो की खुशी का सोच सके,
अपने करमो से किसी के फीके होटो पर मुस्कुराहट ला सके,
अपने हिस्से के सुखो मे से एक हिस्सा भी नही बांट सकते हम?
फिर कैसे अपने को सभ्य मानव कहते है हम?            


मेरी यह रचना तभी सार्थक है जब हम सभी इन्हे सिर्फ़ सहानुभूति ना देकर दिल से इनके लिए कुछ करने का जज़्बा ला सके, क्या हम एक चेहरे को भी सुकून नही दे सकते अपने कुछ प्रयासो से..................


     

Friday, September 14, 2012

आस की कश्तियाँ


मायूसियों ने आज फिर दस्तक दी
खयालो के बंद दरवाजो से निकल
मन के आँगन में बिखरने को
बेताब सी मायूसियाँ
लेकिन आस की एक लौ
जिससे रोशन है दिल की बस्तियाँ
मुस्कुरा के बोली बुझने ना देना मुझे
जीवन में आयेंगे कठोर थपेड़े
वक़्त की आंधियों तले
हमने मिटती देखी हैं
इन थपेड़ो की गिरफ्त में कई हस्तियाँ
जिंदगी की उलझनों से बिफरती
भटकती सी राहो पर
डगमगते कदमो से उठती गिरती
लहरों सी बेबसी की लाचार सिसकियाँ
मन के सागर में उम्मीद के दीये सी
लहरों सी अठखेलियाँ करती
निरंतर बहती जाती है
आस की यह रोशन कश्तियाँ.........किरण आर्य



Thursday, September 6, 2012

रूह तृप्ति


देह से परे भी होता है इक रिश्ता
हाँ रिश्ता रूह से रूह का
दो तन देह की इक चादर में लिपटे
ढूंढते तृप्ति खो एक दूजे में
और समझ तन की तुष्टी को ही
प्रेम की परिणिति खोते
दो तन अस्तित्व अपना
लेकिन होता जब मोह भंग
और टूट जाते भ्रम सभी
क्षणभंगुर इस काया के परिवर्तन
होते परिलक्षित समय संग
देह का सौन्दर्य होता विलुप्त
और रूह तक पहुचने की
राह भी हो जाती ग़ुम
तब रूह का कौमार्य स्थिर सा
देखता मूक हो और
रूह की पिपासा रह जाती
अतृप्त जीवन पर्यंत
चातक सी भटकती
मन की मृगतृष्णा संग
रूह से रूह का प्रेम है
विलग और बिरला सा
जब करती रूह स्पर्श
एक दूजे को तो मिलन
वो होता शब्दों से परे
केवल अहसासों से ही निर्मित
और अहसास नहीं होते
क्षणभंगुर कभी
वो तो रहते जीवंत सदा
जीवन और मृत्यु के
चक्र से परे रूह से ही
पाक साफ़ और पाकीज़ा से..............किरण आर्य