Thursday, August 20, 2015

बावरी चिरैया

एक थी चिरैया, अरे थी नहीं है एक चिरैया, खुराफाती, मस्तमौला सी, बोलने पे आवे तो अच्छे अच्छों कि धज्जियां उड़ा देवे, बोले तो मुहं के आगे किवाड़ न चिरैया के, जो आया दिल, दिमाग, फेफड़े में सब वमन कर हलकी हो लेना चाहती वो, अब चाहे सेहत से भरी पूरी है चिरैया बिलकुल उससे क्या, ऐसे होना तो खाते पीते खानदान से होने की निशानी ! उसे लगता खरे होना ही जीवन का एक मात्र ध्येय है, क्यूकी सोना भी तो खरा है होता, लेकिन बाबरी ये न जानती थी, कि सोने के आभूषण बनाने के लिए उसमें भी मिलावट करनी पड़ती है, और आभूषणों के चलते ही सोना इतनी डिमांड में, तो ये चिरैया ऐसी ही भावुक मूढमति सी थी, दिल कि बहुत साफ़ सहज थी, इसीलिए किसी को मन से अपना मान लेवे थी, तो उसके लिए जी जान लुटाने को तत्पर हो जाती ये, बस आपकी किसी के प्रति जरा भी खुडक हो, या कोई आपसे दुश्मनी कर लेवे तो इस बाबरी चिरैया के साथ बहनापा रिश्तापा गाँठ लो, और फिर अपना दर्द मगरमच्छ से आसूओं के साथ परोस दो इसके समक्ष, साथ में इस चिरैया को वास्ता देना न भूलो भारत कि वीरांगनाओ का, जिनके लिए किसी का भी दर्द पीड़ा सबसे बड़ी, बस फिर क्या है, इतनी सारी वीरांगनाओ में से किसी एक कि आत्मा तुरंत प्रवेश कर जाती इस बावरी के शरीर में, और चिरैया आपकी दुश्मनी का निर्वाह करने में जुट जाती जी जान से, और दुश्मन भौंचक्का कि ये कहाँ से आन टपकी ? बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना सी.....और ये बावरी आपके फटे में टांग ही नहीं अपनी भरी-पुरी काया समेत पूरा प्रवेश कर जाती है, पर है बहुत ही ईमानदार ये बावरी, जिस तरह रिश्ता जी जान से निभाती है, उसी तरह दुश्मनी भी पूरी शिद्दत से है निभाती, इसे लगता है कि, इस मिटटी काया में २०६ हड्डियाँ मॉस के ढाँचे को सबल प्रदान करती, वो भी मृत्यु उपरांत गंगा में विसर्जित हो जाती, और आत्मा भी चोला बदल जाती, यानी कि मरने के बाद खाली हाथ आये खाली हाथ जाना किवदंती प्रचलित, लेकिन ये बावरी अपनी धुन की पक्की अपने साथ दुश्मनी की गठरी लेकर ही जहां से रुक्सती चाहती ! ताकि एक नई विचारधारा कि जन्मदात्री कहलाये कि इस संसार से जाते हुए इंसान कुछ लेकर चाहे न जा पावे, पर दुश्मनी कि गठरी निश्चित ही ले जा सकता साथ अपने !
दूसरी ख़ास बात या कहे चिरैया की दूसरी कहावत आज के समय में जहां एक हाथ दूसरे को कानोकान खबर ना होने है देता कि क्या लिया और क्या दिया ? यह बावरी किसी में जरा सी भी संभावना देख उसे प्रोत्साहित करती दिलो जां से, फिर चाहे प्रोत्साहन पाने वाला इसके ही कंधे पर पाँव रख इसके ही सर पर खड़े हो ता धिन धिन ना ही क्यों न कर जावे, इसे लगता नेकी कर कुँए में डाल, ये भूल जाती आज जमाना नेकी करने वाले को ही लात मार कुँए में पंहुचा देना चाहता है, यह सोचती है आपका काम और काबिलियत है बोलता, यह भोली न जानती आजकल आपका चाम, चार्म और मीठी वाणी में लिपटी चापलूसी का ही बोलबाला, जो इस कला में पारंगत उनका काम या कर्म चाहे दो कौड़ी के क्यूँ न हो, पर प्रतिष्ठा और सम्मान सब उनकी ही बपौती सब उनकी ही झोली में पनाह है पाते, और इसके जैसे खरे बावरे केवल पुस्तकों की भूमिका में ही जगह है पाते, लोग कहते जब इसे अरे बावरी काहे अपने पैरो पर कुलहाड़ी मार रही है, तो यह हंसकर है कहती, कि अरे भैया जब कालिदास पेड़ की जिस शाखा पर बैठ उसको ही काटने के बाद भी महान विद्वान बन सकते है, तो भला मैं क्यूँ नहीं बार बार अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार सियानी न कहला सकूँ हूँ ? अब आप ही बताये इस बावरी चिरैया को कौन समझाए, अब तो बस आप भी हमारे साथ एक दुआ इसके लिए कर ही डाले ......कि खुदा खैर करे ......


Monday, December 22, 2014

कल और आज

अम्मा ने बड़की के मूह पर कस दी थी अपनी हथेली 
और रुदन बड़की का घुट कर रह गया था गले में ही 
आँखों से बह रहा था उसके सैलाब और टाँगे भिची थी 
बंधी थी हिचकियाँ उसकी और अम्मा की हथेली कसी थी 

अम्मा फुसफुसाकर बोली थी चुप कर करमजली 
जो हुआ उसे भूल जा, धो डाल आत्मा पर लगे दाग 
वो बड़े लोग है, मूह खोला तो तबाह हो जाएगा सब 
वो रुंधे गले से दिखाती रही अपने बदन की खरोंचे 
अम्मा कपकपाते हाथों से सहलाती बुदबुदाती रही 

अपनी लाडो को छाती में भीचकर 
कोसती रही गरियाती रही उन दरिंदों को 
और अपने ईश्वर को सुनाती रही खरी खोटी 
इस बात से अनजान, भगवान् पत्थर हो गया अब 

बस जानती थी वो इतना भर ही 
उसकी लाडो की चीख निकली लांघ दालान  
तो पूरा समाज थूकने को हो जाएगा तत्पर 
और वो दरिन्दे नोच लेंगे, वो भी जो रह गया शेष 

अम्मा की हथेली का कसाव बढता गया 
बडकी अम्मा का पल्लू थामे छटपटाहटी रही 
और देखते ही देखते बड़की की सांस गई थम 
अम्मा की हथेली कसी थी कसी रही  

लेकिन पथराई नहीं थी केवल बड़की की आंखें ही 
उस दिन पथरा गया था अम्मा का मन भी
और अम्मा कान में बड़की के अभी भी फुसफुसा रही थी 
चुप रहना मेरी लाडो क्यूकि, चुप रहना ही है नियति हमारी 

अम्मा के चेहरे पर था सुकून बिखरा हुआ 
बडकी को अनंत पीडाओं से मुक्ति जो मिली थी 
फिर कुछ दिन तक अम्मा रही अनमनी कहीं खोई सी 
और फिर एक सुबह अम्मा पकड़ छाती को अपनी 
मार चीत्कारें खून के आसूं रोई थी ............


आज जब छुटकी खड़ी उसी मोड़ पर 
अम्मा की हथेली नहीं कसी उसके मुहं पर 
अम्मा की बुझी हुई आँखों में चमक रही थी चिंगारी 
अम्मा के मन का लावा लगा था दहकने आज 

इस बार छुटकी को सीने में भीच नहीं कहा 
अम्मा ने, चुप कर करमजली 
जो हुआ है उसे भूल जा, धो डाल आत्मा पर लगे दाग 

अपनी छाती में छिपा छुटकी को अम्मा रही थी बडबडा 
मेरी लाडो ये तेरी शर्म नहीं है 
ये शर्म है उन दरिंदो की इस नपुंसक समाज की 
जहाँ हो रही एक बेटी की इज्ज़त नीलाम सरेआम 
और सब तमाशबीन बन है खड़े नज़रे झुकाए 

मत रो मेरी लाडो कर मुखर तू स्वर अपना 
सहना और चुप रहना नहीं है नियति हमारी 
अपनी नियति करेंगे हम स्वयं तय 
नहीं बनने देंगे उन्हें अपना भाग्यविधाता 
जो कहते हमें मुहं मत खोलो रहो चुप 
क्यूकि सहने की प्रथा आई तुम्हारे हिस्से ही 

अपने अस्तित्व को मिटा नहीं ढूंढेगे हम मुक्ति राह 
दिखा देंगे जब दबी चिंगारी मुखरित हो है दहकती 
तो भस्म कर सकती पूरी सृष्टि को वो 
उठ, हो खड़ी मेरी लाडो बन अब, स्वयंसिद्धा तू

छुटकी भय-विफरित आँखों से देख रही थी एकटक 
अम्मा के मुख पर छाई लालिमा और दृढ़ता को
कल की अम्मा का भय आज उसकी ताक़त बन गया 
अब अम्मा ने ठान लिया 
ना सिसक सिसक दम तोड़ेगी लाडो उसकी 
अब एक बार और नहीं अम्मा खून के आंसू रोएगी
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Thursday, December 18, 2014

आज का मनुष्य

आज का मनुष्य
सभ्यता असभ्यता की महीन लकीर के मध्य खड़ा
सभ्यता के विकास का परचम लहराता
दौड़ता सघन गलियारों में
ये दौड़ है शुरू होती
भ्रूण के अस्तित्व पाने की होड़ के साथ

आधुनिकता का जामा पहने मन
आज भी पोषित करता
जंगलराज को ही
कि जो ताक़तवर है वहीँ राजा होने योग्य है
कि जो कमजोर है शिकार होना उसकी नियति है
कि दहशत का पोषण जरुरी है

और शायद इसीलिए आज भी इंसान
अपने अंदर के जानवर को जिन्दा रखे है
रक्त पिपासु जानवर
जो ढूंढता हर पल
ताज़ा रक्त
मांस के लोथड़े जो 
बना देते हैं इन्हें हर बार
और अधिक  खूंखार 
जो ढूंढता है
हर पल नया शिकार
उसके लिए पेट की आग अहम् है

वो नहीं देखता बूढा बच्चा और जवान
उसकी नज़र में शरीर है केवल एक शिकार
संवेदनशीलता, दया, प्रेम ये सब जंजीरे है
सभ्य होने के नाम पर पालतू/भीरु  बनाने की जुगत मात्र
क्योँ कि जानता वो सभ्य हो जाना पिछड़ना है
और असभ्य कहलाना उसके इंसान होने को नकारता है

वो जानवर को मन में संजोये कहलाना चाहता
सभ्यता की अगुवाई करता सभ्य इंसान
इसीलिए खड़ा है असमंजस में
सभ्यता असभ्यता की महीन लकीर के मध्य
एक नई राह की तलाश

हाँ तलाश जारी है और उसके साथ ये अंधी दौड़ भी
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