Thursday, September 24, 2015

खरी खरी (फेसबुक पर डिसलाइक का तड़का)

नमस्कार मित्रो अभी कुछ दिन से लगातार चर्चा में कि फेसबुक पर जल्द ही डिसलाइक का बटन आ रहा है, सुनकर ही दिल डूबने सा लगा सच्च.....अरे घबराए नहीं विचारों के समुन्द्र में जी.....पहले ये होता था कि आपको जो पसंद नहीं आप उसकी पोस्ट पर नहीं झांकेंगे न पढेंगे न कोई टंटा एक मौन सहमती कि आपको मैं पसंद नहीं, तो आप देखे नहीं मैंने क्या लिखा और मुझे आप पसंद न तो मैं आपकी तरफ पीठ भी काहे करू ? यानी शीत युद्ध चलता था.....लेकिन अभी तो शीत युद्ध जैसी पुरातन प्रथा को नेस्तानाबूद करने की तैयारी जी.......हम अपने संस्कारों और प्रथाओं के नाम पर बहुत सी सही और बहुत सी गलत प्रथाओं का निर्वाह आँख मूंदकर करते आये है, और चाहते हमारी भावी पीड़ियाँ भी गलत सही के फेर में पड़े बगैर उनका अँधा अनुकरण करती चले....खैर ये बावरा मन भी न.....भटकन इसकी क्या कहे प्रथाओं के चक्कर में भटक लिया....तो हम आते है मुद्दे पर....अब होगा ये कि जिससे आपकी जरा भी खुडक हो सीधा जाके पोस्ट पर उसकी डिसलाइक का बटन दबा उसको ये बता देने का कि भैये तुम्हारा लेखन एकदम दो कौड़ी का है, और गर आप गुटबाजी के समर्थक तो भाईचारे का निर्वाह करते अपने बंधुवरो के माध्यम से डिसलाइक करा करा बन्दे को अवसाद के गर्त में पंहुचा देने का, ताकि बन्दा लेखन से तौबा कर ले, और फ़तवा जारी कर दे कि मेरी आने वाली सात पुस्त में कोई लिखने का सोचेगा भी नहीं.......हाँ हम जैसे कुछ चिकने घडो की बात अलग है, हमें तो कोई डिसलाइक करे तो हम उसका तहेदिल से शुक्रिया अदा करेंगे, क्युकी उनके डिसलाइक की वजह से लोगो में जिज्ञासा उत्पन्न होगी की भईये आखिर लिखने वाले ने ऐसा क्या लिखा कि इत्ते महानुभाव उसे नापसंद कर रहे है ? उससे होगा ये कि हमारी बात अधिक लोगो तक पहुचेगी, पाठकों की संख्या बढ़ना यानी लिखना सार्थक हो जाता.......और नापसंद करने वालो में कुछ मशहूर तथाकथित अच्छे लेखक हो तो पूछिये मत आपकी तो किस्मत ही चमक गई साहब........खैर ये तो है मेरे बावरे से मन की बात आपकी आप सोचिये जनाब..........दिल्ली से खरी खरी के साथ खुराफाती किरण आर्य

खरी खरी (कुंठित मानसिकता)

नमस्कार मित्रो आज दिमागी कीड़े तनिक बौखलाए हुए है.......छत्तीसगढ़ बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन की ओर से छपने वाली एक किताब में महिलाओं के कामकाजी होने को बढ़ती बेरोजगारी का दोषी बताया गया है. देश की आर्थिक समस्याएं और चुनौतियां वाले चैप्टर में यह कहा गया है कि आजादी के बाद देश में बेरोजगारी इसलिए बढ़ी, क्योंकि हर सेक्टर में महिलाओं ने काम करना शुरू कर दिया है.....यानी महिलाओं का काम करना गुनाह हो गया, जाने क्यों महिलाओं को अक्सर सहजता से कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है ? शायद ये रीत हो गई है, यहीं तो होता आया है सदियों से.....देश को आज़ाद हुए इतना समय हुआ लेकिन ससुरी मानसिकता अभी भी गुलाम ही रह गई, कहते है जीवन परिवर्तनशील है रुत बद्लती है, मौसम बदल जाते है, सदिया है बीतती और युग बदल जाते है, फिर मानसिकता काहे आज भी वहीँ बंधी एक खूटे से अंगद के पाँव सी....आज हम आधुनिक होने का दम भरते है, फिर मानसिकता आज भी क्यों स्त्री को लेकर कुंठित सी है ? ये कटु सत्य है जो अपच का कारण हो सकता है.....मानती हूँ परिवर्तन की गति धीमी होती है.....लेकिन एक विशेष वर्ग की बात छोड़ दे तो माध्यम वर्गीय स्त्रियाँ आज भी इस पीड़ा से मुक्ति राह खोजने में लीन है, क्या करे समाज परिवार की इज्ज़त उनके कंधो पर जो टिकी है......यहाँ दोषी केवल एक कुंठित मानसिकता है कोई वर्ग विशेष नहीं, और कुंठा से कोई भी ग्रसित हो सकता है.......ये ध्यान रहे.......दिल्ली से खरी खरी के साथ खुराफाती किरण आर्य

Friday, September 18, 2015

खरी खरी (दिल का दर्द)

हर बावरी है कहती पति परमेश्वर मेरा स्वामी मेरा प्राण प्यारा, जब ईश्वर का दर्जा दे ही दिया मान ही लिया उसे स्वामी तो फिर वो दिखाए स्वामित्व प्रभुत्व तो काहे महिला सशक्तिकरण का झंडा उठा चिल्लाना जी ? मानसिकता गुलाम प्रवृति को सर माथे लगा ही चुकी है, सदियों से चली आ रही प्रथा लड़की जरा बड़ी हुई नहीं संस्कारों इज्ज़त की बेड़ियाँ पहन पाँव में नाचती ख़ुशी ख़ुशी.......ऐसे मत चलो ऐसे मत हंसो ऊंची आवाज़ में मत बोलो सलीके से रहो......और सबसे बड़ी बात कि अभी बिटिया बड़ी हो रही तो घर के काम काज रसोई बनाना सिखाओ ताकि दूजे घर जाके गाली सुनने को न मिले.......चाहे लड़की जिला क्लेक्टर हो या मंत्री संत्री लेकिन खाना बनाना घर में उसकी जिम्मेदारी, बच्चे कुछ अच्छा कर जावे तो पिता की छाती चौड़ी और जरा गलत चले तो तुम जरा सा बच्चो को भी नहीं संभाल सकती हो ? कमजोर अबला कहलाती और ऑफिस से आके खाना बनाने से लेकर सारी जिम्मेदारी उसके ही सर, गजब बात है ना प्रबल कहलाने वाला पुरुष ऑफिस से आके टीवी देखता खाना खाता और फिर थककर सो जाता और कमजोर महिला ऑफिस से आ बच्चो को देखती खाना बनाती रसोई बना किचेन साफ़ कर सोती सुबह की सब व्यवस्था निपटाकर.....हास्यपद लगता सच बहुत......कल बेटी बोली मम्मा आज टीचर पढ़ा रही थी तो विषय के बीच में आया कि पैर चौड़े कर खड़े होना स्त्री का बुरा क्यों समझा जाता है? बोली मैंने तुरंत कहा मेम ये माना जाता है जो स्त्री पैर चौड़े कर खड़ी होती है वो चरित्रहीन होती है तो उसकी मैडम ने हँसते हुए कहा जानती हो वास्तव में पैर चौड़े कर खड़ा होना आत्मविश्वास की निशानी होती है, लेकिन इसे स्त्री के चरित्र से इसीलिए जोड़ दिया गया ताकि स्त्रियाँ पैर चौड़े कर खड़ी न हो पावे........सुनकर सोच में पड़ गई मैं ? फिर लगा इसमें सोचना कैसा रे यहीं तो होता आता है, अरे तू लड़का है घर का काम बहन को करने दे, लड़के रोते नहीं है, बस रुलाते है ....और लड़की लेकर भाग गया या प्रेम कर बैठा तो कोई नहीं इस उम्र में करते ऐसे कर्म लड़के.....ओह्ह्ह शराब पीने लगा है, या रात की पार्टियों में जाता है, लड़का जवान हो गया है.......दोहरी मानसिकता पुरुष करे तो जायज़ और स्त्री करे तो पाप महापाप.....और कह दो आप तो निरी स्त्रीवादी......यानी कहना भी गुनाह........सहो सहो और चुप रहो यहीं नियति तुम्हारी....स्त्री पुरुष एक ही रथ के दो पहिये है, एक दूजे बिन अधूरे एक दूसरें के पूरक फिर काहे नहीं बराबर ? समाज ने दिया ये ढांचा हमारी पुरातन परम्पराओं से चलता आ रहा ये तो.....यहीं कहेंगे न आप.......अरे बई क्यूँ नहीं इस ढर्रे को बदला जा सकता आखिर समाज हमसे ही बना है न? जब संसार परिवर्तनशील है, तो यहाँ आके क्यों सोच गच्चा खा जाती जी ?.........आज की बात करे तो कुछ पढ़े लिखे दम्पतियों में जो दोनों ही काम करते बाहर जाके घर से बदलाव आया है, वो समझते है स्त्री भी उनकी तरह इंसान हाड मॉस का पुतला है, तो देते साथ समझती उसकी भावनाओं को......जो करते ऐसा वो मासूम बेक़सूर समझे खुद को मेरे कटघरे से बाहर खड़ा........और सही मायनों में कहूँ तो स्त्री जहाँ खड़ी उसके लिए उसकी जिम्मेदारी भागीदारी अधिक है, वो नियति मान बैठी इसे खुद की, महान कहलाने की चाह बड़ी आखिर........सहनशील, त्याग की मूर्ति, प्रेमी ह्रदय कहलाने का मोह जाने कब छोड़ेगा पीछा उसका जाने कब ?........दिल्ली से दिल के दर्द का वमन करती खरी खरी के साथ खुराफाती किरण आर्य