Friday, October 7, 2011

तुम बिन

ए मेरी जीवन संगिनी तुम कहाँ हो गई हो ग़ुम? 
जैसे शाम होते ही सूरज,
छिप जाता है सागर के आगोश में,
वैसे ही तुम खो गई क्यों चिर निंद्रा में,
जब थी तुम पास मेरे हर क्षण,
तब जान ही नहीं पाया क्या अहमियत है,
तुम्हारे होने की इस जीवन में,
आज जब तुम नहीं हो संग मेरे,
तब जीवन की धूप ने झुलसा दिया तन और मन,
और अहसास हुआ अपने अधूरेपन का,
हूँ शून्य मात्र मैं तुम बिन,
वैसे ही जैसे पतझड़ में फूलो के,
गिरने से आती है विरानी,
तुम थी तो जीवन था स्वछंद पक्षी समान,
हर चिंता और दुःख को तुम्हारी हंसी और प्यार,
बहा ले जाता था दूर अनंत में कहीं,
आज फिर तुम संग बीते पलों को जीना चाहता हूँ,
तुम्हारे प्यार को सहेजना चाहता हूँ,
जो फिसल गए मुठ्ठी से मेरी रेत के मानिंद,
एक बार फिर उन पलों को समेटना चाहता हू,
तुम संग जीना चाहता हूँ,
और बस यहीं कहना चाहता हूँ,
तुम बिन छिन्न भिन्न हो बिखर गया जीवन मेरा,
लौट आओ एक बार फिर सावन बन, 
बरस जाओ फिर जीवन में मेरे खुशियाँ बन..........किरण आर्य

Sunday, September 25, 2011

दिल बनाम आलू


प्रति जी से सुनी जब यह बात, दिल जिसे समझे थे,
हम कभी पागल, दीवाना, बच्चा और अनजाना,
वो तो आलू है जी हा दिल तो आलू है !

सुनकर उनकी यह अनोखी बात,
हंसी की लहर ने शोभित किया मुखमंडल,
और मन में लहराए जज़्बात वाह जनाब !!

यह दिल तो बड़ा चालू निकला, समझे थे क्या इसे,
यह तो आलू निकला हाजी हा आलू निकला !!

सब्जिओ के बढते देख भाव,
दिल ने भी नेताओ जैसे बदले पैतरे है,
इस दिल के भी देखो अजब नखरे है !!

सोचा दिल ने आलू की बदती लोकप्रियता को,
क्यों भुनाया जाए,
अब अपने आपको आलू ही कहलाया जाए !!

सब्जिओ में आलू है सदाबहार,
तो आज इसे ही पहनते है विजय हार,
तो इस तरह जनाब आज दिल यह अब आलू है,
देखा आपने भी, यह कितना चालू है............... किरण आर्य

जीवन एक पाठशाला


जीवन एक पाठशाला है,
यहाँ हर कदम पर जिंदगी एक पाठ पदाती है,
कभी हँसाती है तो कभी रुलाती है !

यहाँ हर कदम पे खड़ी खुशिया पंख पसार,
मिलते है यहाँ दुःख और गम भी अपार,
लेकिन फिर भी यह जिंदगी,
खुशिओ संग खुश होती,
और दुखो में हमें सहेजती,
निरंतर आगे बदती जाती है !!

कभी सेहरा में भटकते मुसाफिर की मृगतृष्णा सी,
कभी सागर की डूबती उतरती लहरों सी,
कभी जेठ की दुपहरी की तपन सी,
कभी फूलो की खुशबू से निर्मल झोंखे सी,
जिंदगी तेरे हर रंग लगे न्यारे है !!

हम खुशिओ संग खिलखिलाते,
गमो से पार पाते,
जब भी मुस्कुराते यहीं कहते,
जिंदगी लगती कभी तू अपनी,
तो कभी नितांत बेगानी सी !!!

फिर भी तुझसे मुझे प्यार है,
तुझसे ही है खुशिया मेरी,
तू ही तो मेरी पहचान है,
इसीलिए तो जिंदगी,
तुझमे बसी मेरी जान है...........किरण आर्य