Friday, October 18, 2013

हर्फ़

मन की किताब हर हर्फ़ 
हाथ की लकीर सा 
लेता आक़ार 
हर पन्ने से जीवंत हो एहसास 
पंख लगा लगते है 
उड़ने पंछी से 
अंनत का आकर्षण 
उसका मोहपाश 
खीच रहा जैसे उन्हें अपनी ही ओर 
हर्फ़ों का भी होता 
अपना ही जहां 
 जहाँ विचरते स्वच्छंद 
वो यहाँ वहां 
कुछ हर्फ़ कशमकश में 
डूबते उतरते 
बौराई लालसाओं से 
भटकते दौड़ते 
निरंतर शून्य में दौड़ते 
वैसे ही जैसे एक भ्रूण 
अपने अस्तित्व की 
अंधी दौड़ में दौड़ता सरपट 
चाह प्रथम आने की 
वजूद के स्थायित्व को वरने की 
कुछ शब्द क्लांत से 
अपने में गुम अनमने से 
कोई कोना ढूंढते सीला सा 
जहाँ वो पा सके पनाह 
कुछ शब्द ऐसे भी 
जो मुस्कान है समेटे 
अपने आँचल में 
हँसते खिलखिलाते 
और आँखों में बस है जाते 
सुनहरे स्वप्न से 
और इस तरह मन की किताब 
उसका हर हर्फ़ 
सहलाता दुलारता हँसता रुलाता 
कभी उदासी से भर जाता 
लेकिन फिर भी हर शब्द 
मन की किताब में 
पनाह पा ही जाता ..........है ना

1 comment:

शुक्रिया