Monday, December 22, 2014

कल और आज

अम्मा ने बड़की के मूह पर कस दी थी अपनी हथेली 
और रुदन बड़की का घुट कर रह गया था गले में ही 
आँखों से बह रहा था उसके सैलाब और टाँगे भिची थी 
बंधी थी हिचकियाँ उसकी और अम्मा की हथेली कसी थी 

अम्मा फुसफुसाकर बोली थी चुप कर करमजली 
जो हुआ उसे भूल जा, धो डाल आत्मा पर लगे दाग 
वो बड़े लोग है, मूह खोला तो तबाह हो जाएगा सब 
वो रुंधे गले से दिखाती रही अपने बदन की खरोंचे 
अम्मा कपकपाते हाथों से सहलाती बुदबुदाती रही 

अपनी लाडो को छाती में भीचकर 
कोसती रही गरियाती रही उन दरिंदों को 
और अपने ईश्वर को सुनाती रही खरी खोटी 
इस बात से अनजान, भगवान् पत्थर हो गया अब 

बस जानती थी वो इतना भर ही 
उसकी लाडो की चीख निकली लांघ दालान  
तो पूरा समाज थूकने को हो जाएगा तत्पर 
और वो दरिन्दे नोच लेंगे, वो भी जो रह गया शेष 

अम्मा की हथेली का कसाव बढता गया 
बडकी अम्मा का पल्लू थामे छटपटाहटी रही 
और देखते ही देखते बड़की की सांस गई थम 
अम्मा की हथेली कसी थी कसी रही  

लेकिन पथराई नहीं थी केवल बड़की की आंखें ही 
उस दिन पथरा गया था अम्मा का मन भी
और अम्मा कान में बड़की के अभी भी फुसफुसा रही थी 
चुप रहना मेरी लाडो क्यूकि, चुप रहना ही है नियति हमारी 

अम्मा के चेहरे पर था सुकून बिखरा हुआ 
बडकी को अनंत पीडाओं से मुक्ति जो मिली थी 
फिर कुछ दिन तक अम्मा रही अनमनी कहीं खोई सी 
और फिर एक सुबह अम्मा पकड़ छाती को अपनी 
मार चीत्कारें खून के आसूं रोई थी ............


आज जब छुटकी खड़ी उसी मोड़ पर 
अम्मा की हथेली नहीं कसी उसके मुहं पर 
अम्मा की बुझी हुई आँखों में चमक रही थी चिंगारी 
अम्मा के मन का लावा लगा था दहकने आज 

इस बार छुटकी को सीने में भीच नहीं कहा 
अम्मा ने, चुप कर करमजली 
जो हुआ है उसे भूल जा, धो डाल आत्मा पर लगे दाग 

अपनी छाती में छिपा छुटकी को अम्मा रही थी बडबडा 
मेरी लाडो ये तेरी शर्म नहीं है 
ये शर्म है उन दरिंदो की इस नपुंसक समाज की 
जहाँ हो रही एक बेटी की इज्ज़त नीलाम सरेआम 
और सब तमाशबीन बन है खड़े नज़रे झुकाए 

मत रो मेरी लाडो कर मुखर तू स्वर अपना 
सहना और चुप रहना नहीं है नियति हमारी 
अपनी नियति करेंगे हम स्वयं तय 
नहीं बनने देंगे उन्हें अपना भाग्यविधाता 
जो कहते हमें मुहं मत खोलो रहो चुप 
क्यूकि सहने की प्रथा आई तुम्हारे हिस्से ही 

अपने अस्तित्व को मिटा नहीं ढूंढेगे हम मुक्ति राह 
दिखा देंगे जब दबी चिंगारी मुखरित हो है दहकती 
तो भस्म कर सकती पूरी सृष्टि को वो 
उठ, हो खड़ी मेरी लाडो बन अब, स्वयंसिद्धा तू

छुटकी भय-विफरित आँखों से देख रही थी एकटक 
अम्मा के मुख पर छाई लालिमा और दृढ़ता को
कल की अम्मा का भय आज उसकी ताक़त बन गया 
अब अम्मा ने ठान लिया 
ना सिसक सिसक दम तोड़ेगी लाडो उसकी 
अब एक बार और नहीं अम्मा खून के आंसू रोएगी
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Thursday, December 18, 2014

आज का मनुष्य

आज का मनुष्य
सभ्यता असभ्यता की महीन लकीर के मध्य खड़ा
सभ्यता के विकास का परचम लहराता
दौड़ता सघन गलियारों में
ये दौड़ है शुरू होती
भ्रूण के अस्तित्व पाने की होड़ के साथ

आधुनिकता का जामा पहने मन
आज भी पोषित करता
जंगलराज को ही
कि जो ताक़तवर है वहीँ राजा होने योग्य है
कि जो कमजोर है शिकार होना उसकी नियति है
कि दहशत का पोषण जरुरी है

और शायद इसीलिए आज भी इंसान
अपने अंदर के जानवर को जिन्दा रखे है
रक्त पिपासु जानवर
जो ढूंढता हर पल
ताज़ा रक्त
मांस के लोथड़े जो 
बना देते हैं इन्हें हर बार
और अधिक  खूंखार 
जो ढूंढता है
हर पल नया शिकार
उसके लिए पेट की आग अहम् है

वो नहीं देखता बूढा बच्चा और जवान
उसकी नज़र में शरीर है केवल एक शिकार
संवेदनशीलता, दया, प्रेम ये सब जंजीरे है
सभ्य होने के नाम पर पालतू/भीरु  बनाने की जुगत मात्र
क्योँ कि जानता वो सभ्य हो जाना पिछड़ना है
और असभ्य कहलाना उसके इंसान होने को नकारता है

वो जानवर को मन में संजोये कहलाना चाहता
सभ्यता की अगुवाई करता सभ्य इंसान
इसीलिए खड़ा है असमंजस में
सभ्यता असभ्यता की महीन लकीर के मध्य
एक नई राह की तलाश

हाँ तलाश जारी है और उसके साथ ये अंधी दौड़ भी
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Monday, December 15, 2014

...... से 'अस्तित्व तक '



रोजमर्रा की आपधापी
अस्त व्यस्त सी जिन्दगी
चलती एक ढ़र्रे पर
आस निराश के साथ
चहलकदमी करती
थोड़ी सी धूल
थोड़े से थपेड़े
थोड़ी सी आशा
थोड़ा सा विश्वास
थोड़ी सी धूप
थोड़ी सी छाँव
थोड़ी सी चांदनी
थोड़े से सपने
थोड़ी सी किरचे
थोडा सा अवसाद
थोडा सा चिंतन
और ऐसे ही
थोडा थोडा करके
हो जाता जाने
कितना कुछ एकत्र
मन के घरौंदे में
इसी घिचपिच से
उपजते है विषाद
असमंजस और घृणा
जैसे अनगिनत भाव
बिखरने लगता है
बहुत कुछ और
घुटने लगते है प्राण
उखड़ने लगती है सांसे
मस्तिष्क में मचता है
तीव्र सा कोलाहल
और तब कानों को बंद कर
मन व्यग्र जो
चीख उठता है राह पाने को
बंद हो जाती आंखें स्वत ही
और यहीं जन्मता है मनन
आँखों के कोर भिगोता
जो सहेजता है
सारे बिखराव को सिरे से
और जो कुछ भी है
थोडा थोडा
उस सबको करता है प्रदान
पूर्णता
वैसे ही जैसे
गोधूली बेला में
उडती धूल में धुंधला जाता
पेड़ों का अक्स
सब होने लगता है धूमिल
और ऐसे में चन्द्र-किरण
धुंधलाते प्रतिबिम्ब को
अपनी रौशनी की चादर में
समेट करती प्रदान
अस्तित्व

Monday, December 8, 2014

प्रेम स्वरुप

सुघड़ स्त्री संस्कारी स्त्री 
कर्तव्य-परायण स्त्री 
सहनशील परोपकारी 
ममतामयी स्त्री 
जो कुछ आता 
उसके कर्तव्यों की परिधि में 
बड़ी निपुणता सजगता के साथ 
करती निर्वाह उसका 
स्त्री सखी सहयोगी जीवन-संगिनी 
हर रूप में होती मुस्कुराती खड़ी स्त्री 

उसके अंतस की पीड़ा 
फफोलों सी हो जाने पर भी 
अपनी आँखों के तैरते समुंदर को 
सहज भाव से छिपा लेती अपनी मुस्कराहट में 
भरी आँखों से मुस्कुराने का हुनर 
जाने कब आ गिरा उसकी झोली में नेमत सा 

और जब अपनी परिधि से परे 
कुछ कर बैठती वो 
तुरंत कटघरे में खड़ी कर दी है जाती 
यकायक अन्तर्यामी हो उठता हर मन 
बेढब हो जाते स्त्री के सब रंग ढंग 
हर तरफ से उठती उँगलियाँ उसकी तरफ 
जो बेध जाती उसके अस्तित्व को 

इतनी चालाकी त्रियाचरित्र की स्वामिनी स्त्री 
प्रेम के सीधे से समीकरण को पुरुष के 
क्यों नहीं है समझ पाती ? 
कि प्रेम तन की परिधि से बंधा होता है 
कि मन का समर्पण प्रेम को कब प्रदान कर पाया पूर्णता 
क्यों वो ठगा सा है महसूस करती ?
जब योनी का आकर्षण उसके प्रेम पर हावी है हो जाता 
प्रेम में सम्पूर्ण समर्पण के नाम पर 
अपना सब कुछ लुटा देने वाली स्त्री 
क्यों पछतावे की अग्नि में भस्म कर देती अपना सर्वस्व ?

उसका मूढमति होना हाँ यहीं है कारन 
जो वो नहीं कर पाती सही आकलन 
पुरुष के प्रेम दर्शन का सही मायनों में 
जिसे वो समझती पुरुष का वासना प्रेम 
वो तो पुरुष का बड़प्पन है,
जो बनाता है पुरुष को सर्वश्रेष्ठ 
और इसी प्रेम से वो स्त्री के नारीत्व को पूर्णता है प्रदान करता 
और इसीलिए पुरुष के प्रेम से विलग 
जो स्व की तुष्टि पर निर्भर होता पूरी तरह 
प्रेम का कोई स्वरुप हो ही नहीं सकता
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Wednesday, December 3, 2014

व्यंग बेमेल विवाह

आज फिर दिमागी केंचुए कुछ सक्रिय हुए जब नज़र पड़ोस में रहने वाले चुकुंदीलाल जी पर पड़ी, 85 साल के श्री चुकुंदीलाल पुरातत्व विभाग में रखे किसी स्मृति चिन्ह से प्रतीत होते है, 85 साल की बांकी उम्र में नकली दांतों के साथ दन्तुरित मुस्कान बिखेरते अपनी आधी चाँद को जब सहलाते है तो पुराने हीरो बारी बारी मानस पटल पर आकर अपने स्टाइल में मुस्कुराते है ! अभी कुछ महीने पहले ही इस बांकी उम्र में श्री चुकुंदीलाल 26 साल की डॉली (जो अपनी जीरों साइज़ फिगर से सभी के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है, यानी बोले तो पूरे मुहल्ले की आँखों का नूर )....के साथ विवाह के अटूट बंधन में बंधे है, डॉली के शुभ चरण चुकुंदीलाल के उजाड़ जीवन में क्या पड़े चहुँ तरफ हरियाली छा गई है, और उनका बांकपन और निखर आया है, आजकल जनाब डेनिम जीन्स और टी शर्ट में घूमते नज़र आते है, और अपनी हर अदा पर इतराते है, उन्हें देख बेमेल विवाह पर बहुत से प्रश्न हमारे जेहन में मंडराने लगे काले बादलों से .....हमने जब डॉली को देखा तो तपाक से पूछा कि छोटी उम्र के सभी पुरुष क्या वनवास वासी हो गए है ? या कुंवारे कम उम्र युवकों का अकाल पड़ा है ? जो तुमने इतनी उम्र के पुरुष से विवाह किया और उसके बाद कैसे इतनी खुश नज़र आती हो ? तुम्हारी ख़ुशी नज़रों का छलावा या सच है ? तो डॉली ने खिलखिलाते हुए नैन मटकाकर कहा मिसेज आर्य मुझे बताये बेजोड़ विवाह की परिभाषा क्या है ? उसने अदा से सवाल मेरी तरफ उछाला और मेरी बड़ी बड़ी आँखों में झाँकने लगी, मैंने अपनी सोच के घोड़ो को दौड़ाया तो दिमाग ने सिंपल सा उत्तर चिपकाया बेजोड़ विवाह यानी जिसमे स्त्री पुरुष की आयु में अधिक अंतर ना हो, जोड़ी ऐसी हो जिसे देख सब आहें भरे, और उस जोड़े के पूरे 36 गुण मिले, लेकिन एक असमंजस ने ली जम्हाई और सामने हो खड़ा मुस्कुराया, बेजोड़ विवाह में पत्नी शुरुवाती दिनों में मृगनयनी चंद्रमुखी सी है लगती, पति उसके कदमो तले बिछा है जाता उसकी हर अदा पर वारि वारि जाता, उसके कुछ साल बाद जब चंद्रमुखी होने लगती है पुरानी तो हर घर की होती लगभग एक सी कहानी....उसकी शीतलता तपिश में होने लगती है तब्दील और चंद्रमुखी हो जाती है सूरजमुखी, उसका आकर्षण होने लगता है कम और फिर साल दर साल है बीतते और फिर एक दिन वो हो जाती है ज्वालामुखी, जिसका स्वर हो जाता कर्कश, फीगर जाता है बिगड़ और उसकी सूरत देख पति गाता मन ही मन " जाने कहाँ गए वो दिन " यहाँ पर " घर की मुर्गी दाल बराबर " कहावत पूरी तरह चरितार्थ होती नज़र है आती, और वो मृगनयनी गले का फंदा है बन जाती ! फिर बेजोड़ विवाह का औचित्य क्या रह जाता ? जब रिजल्ट उसका ज्वालामुखी रूप में सामने है आता, और रिश्ते के सभी जोड़ है ढीले पड़ जाते ........अभी हम सोच के समुन्दर में गोते लगा ही रहे थे कि क्या पता तलहटी में विचरते हुए कुछ ज्ञान रुपी मोती हाथ लग जाए, डॉली की मदमाती आवाज़ ने हमारी तंद्रा को कर दिया भंग, बोली कहाँ हो गई आप गुम मिसेज आर्य ? बोली सुनिए मैं बताती हूँ आपको आज ज्ञान की बात......एक स्त्री को शादी के बाद क्या चाहिए ? एक पति जो उसपर जान न्योछावर करने को तत्पर रहे, उसके मूह से निकली हर फरमाइश को आनन् फानन में पूरा करे, उसके सभी शौक पूरे करे जान पर खेलकर, और उसे गृहलक्ष्मी मान लक्ष्मी की कुंजी उसके हाथ में रख कहे तुम रानी हो घर की राज करो घर पर और मुझपर भी ..........चुकुंदीलाल अमीर इंसान है, और उम्र अधिक होने के कारन मुझपर दिलो जान से मर मिटने को अमादा है, मेरे मूह से कुछ निकलने से पहले ही हाथों में थाल सजाये मेरी हर फरमाइश पूरी करने को तत्पर रहते है, और मुझे जीवन संगनी के रूप में पाकर धन्य हुए जाते है, अब इससे ज्यादा और क्या चाहिए एक पत्नी को जीवन में ? हमने मुस्कुराकर उसकी बात का अनुमोदन ठीक उसी प्रकार किया जैसे किसी बाबा के प्रवचन पर उसके शिष्य धन्य हुए जाते है, सच ही तो कहा डॉली ने अब उनके विवाह की हम बात करे तो चुकुंदीलाल इस उम्र में ये सोचकर इठलाते है कि हाय इस उम्र में भी हमारा बांकपन कुछ ऐसे बरक़रार है की डॉली जैसी कमसिन बाला हमसे शादी करने को तत्पर हो गई, हमारे प्रेम में आज भी इतनी गर्मी है यानी की हमारा "हॉटपन" आज भी बरक़रार है, यहीं सोच दिन में कई बार आईने को कृतार्थ करते है ! और दूसरी और डॉली ये सोचकर खुश है कि ये बुढाऊ ज्यादा दिन छाती पर मूंग ना दलने वाले है, जैसे ही कूंच कर जायेंगे, इनकी सारी संपति की स्वामिनी बन इठलाऊंगी, और जब तक ये जिन्दा है, तब भी मेरे ही आगे पीछे मंडराएंगे, मेरी हर फरमाइश पर दिलो जान लुटाएंगे, तो कुल मिलाकर हमें ये बात समझ में आई, कि इस ब्रह्माण्ड में बेजोड़ विवाह वहीँ है जहाँ पर मुगालते मन के रहे ताउम्र बरक़रार और खुशियों के भ्रम रूपी फूल खिलते रहे और चेहरे बहुत सारे मेकअप के साथ खिलखिलाते रहे, और दिल गीत मिलन के गाते रहे, और साथ ही बेमेल विवाह मन में पनपी गलत धारणा मात्र है जिसका यथार्थ जीवन में कोई स्थान नहीं है, वो सुना है आपने दिल मिले का मेला है वर्ना तो यहाँ हर इंसान अकेला है, कागज़ के फूलों से खुशबू की दरकार के स्थान पर फूल चाहे हिंदी का हो या अंग्रेजी का बस खुशबू से सरोकार रहे तो जीवन सफल है I..............

Friday, November 7, 2014

एक कहानी

निस्तेज सी पड़ी 
जमीन पर वो 
चिरनिद्रा बसाए 
बुझे नयनों में 
असीम शांति है 
मुख पर उसके 
और सामने बैठा है 


जो शख्स वो बहुत 
ख़फ़ा उससे 
घूरता उसे, कैसे ?
उससे पूछे बगैर 
वो सो रही 
एक मीठी नींद 
हाँ आज तक 
जो उसने चाहा 
वहीँ तो करती आई वो 
उसने कहा मुस्कुराओ 
तो मुस्कुरा दी वो 
आँखों में प्रेम सजाये 
उसने कहा प्यार करो 
तो टूटकर सिमट गई 
आगोश में उसके 
उसने कहा दुखी है मन 
तो उसके दुःख से 
भीग उठा अंतस उसका भी 
और मासूम सा 
चेहरा उसका 
दुःख की बदली में 
छोड़ आया अपनी मुस्कान 
उसने कहा बेचैन हूँ मैं 
तो उसकी बेचैनी 
रातों की करवटें 
बन गई उसकी 
उसने कहा 
सुख की चाह है मुझे 
तो सुख की परिभाषा 
बन गई वो 
उसकी ख़ुशी उसकी चाह 
उसका प्रेम उसका दुःख 
हाँ उसे ही तो जीती आई वो 
और भूल गई खुद को 
अपने वजूद को 
बना स्वयं को परछाई उसकी 
लेकिन आज कैसे ?
उससे पूछे बगैर 
चल पड़ी वो 
एक अनजान सफ़र पर 
अकेली बेबाक 
बिना उसकी इज़ाज़त के 
अपनी मर्यादा से परे 
ठुकराकर उसका प्रेम 
और स्वयं उसे 
शायद सहने की 
इंतिन्हा की तपिश 
या फिर मुक्ति की राह 
या विद्रोह मूक सा 
कर गया विवश उसे 
या फिर लगा उसे 
यहीं एकमात्र जरिया 
अपने हिसाब से जिन्दगी से 
कुछ पल चुरा लेने का
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Tuesday, October 28, 2014

वो आदमी

कल मैं मिली मौत से पहले मरे हुए आदमी से, जो पूरी सभ्यता को भद्दी गालियों से गरियाता है, और अपने पार्थिव शरीर को ढ़ोता लतियाता है, वो अपनी ही धुन में रमता हठी सा योगी है, घुम्मकड प्रवृति का, रह्गिरी के गुण में माहिर जोगी है I
उसके अन्दर है एक आग, जो जीवित रखे है उसे आज भी, वो है उसका सतत विचारों से जूझना, भटकना निरंतर भटकना और भटकना, फिर एक दिन कवितायेँ फूटतीं है अचानक, सोतों सी उसके अंतस से, और वो कविताओं का जखीरा लिए विजयी भाव से, कोलंबस सा मुस्कुराता है, जैसे उसकी खोज हुई पूरी, उसकी बेचैनी को विराम मिला, और फिर वो हो जाता है रीता सूखे घड़े सा, बदरंग गरियाता अपनी लाश को लात से ठेलता, तिल-तिल मरता अपने पार्थिव शरीर को ढ़ोता I
उसके मृत शरीर से एक तीव्र सड़ांध है उठती, जो नथुनों से है टकराती, नाक के बाल तक है जला जाती, असहनीय सी दुर्गन्ध जो मन को विचलित कर जाती, अपान वायु के प्रभाव से उपजे वैराग्य भाव सी, लेकिन उसके विचारों की उर्जा उस दुर्गन्ध को दबा जाती, और वो सड़ांध हो विलीन कहीं, यथार्थ के धरातल को है घूरती, यकायक गड्डों में धंसी वो आंखें है मुस्कुराती, और तब आता है समझ, कि कैसे मर चुका वो शरीर, आज भी जीने की चाह को करता पोषित है, और मौत से नज़रे चुराता है गरियाता है लतियाता है लेकिन जब बात आती है जिन्दगी की, तो पोपले से गालों टूटते हुए दांतों बिखरे बेतरतीब से बालों में, मुस्कुराता जिन्दगी के नगमे गाता है I
कभी आसमान में धान रोपने में तल्लीन, कभी अपनी कविताओं में उपनिषदों का आत्मवाद, बुद्धिष्ट अनात्मवाद, भक्तों का मानवतावाद और कम्युनिष्टों का समतावाद, समाहित करने की तत्परता के साथ विश्व संस्कृति की बात करता वो, कभी ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार कर उसमे लीन होने को आतुर, कर्मठता का यहीं भाव है, जो उसे मरने नहीं देता I
घूरकर देखना और फिर पागल समझे जाने की बात सोच, शरमा जाना और फिर हिचकते हुए मन के इस भाव की व्याख्या करना, और खुलकर मुस्कुराना उसका कर जाता है चकित, ऐसी निश्चलता सहजता सरलता और विचारो की गूढता, क्या दिखती है तथाकथित बुद्धिजीवी सभ्य समाज में ? जो मुखौटों के आवरण ओढे अपने दंभ में आसमां की तरफ मूह कर, थूकने को अमादा है, इस सत्य से अनभिज्ञ की वो थूक गिरेगा उनके ही मूह पर I
वो मात्र अभिनय है नहीं करता नेता होने का, केवल चिल्लाकर आश्वासन के टुकड़े नहीं है फेंकता, वो परचम है लहराता उस विश्वास का, जो उसकी धंसी आँखों में जिन्दा है, कि बदलेगा सब, सिर्फ आग चाहिए, और वो उसी आग को पाने की ललक में, प्रयास है करता फूंक मारता निरंतर बुझी राख में, चिंगारी पैदा करने के अथक प्रयास में लीन !
वो संत परंपरा और मौखिक परंपरा का उतराधिकारी कहलाता है, और इस बात से उसके मन में फैलाव का एक सागर लहराता है, वो चूहे पर हाथी के सवार होने की बात को जायज़ ठहराता है, वहीँ चूहे पर हाथ के सवार होने को सिरे से खारिज है करता, जो ये दर्शाता है, कि उसकी संवेदनाये अभी सजीव है, और ये जीवंतता जो यकायक उसके मुख पर पसर जाती है, शरीर की नश्वरता को ठेंगा दिखाती उस मरे हुए आदमी में जीने की ललक जगा जाती है I *******************************************

Monday, October 13, 2014

शब्द


शब्द 
पूर्ण समर्पण है मांगते 
अधूरे मन से 
कुछ नहीं होता हासिल 
शब्द 
समय के मोहताज़ नहीं होते 

शब्द
पूस की दुपहरी में 
सूरज की आंच पा मुस्कुराते है 
शब्द
वक़्त की तेज़ आंधी में 
कभी उड़कर कहीं खो जाते है 

शब्द
बारिश में भीग कर 
कभी सीले से नज़र आते है 
शब्द
जेठ की गर्म लू 
में झुलस धूमिल हुए जाते है

शब्द
मरू की भटकन में कभी 
मृगतृष्णा के मोह में नीर बहाते है 
शब्द
को अगर राह मिल जाए 
तो इन्द्रधनुष से ये बिखर जाते है 

शब्दों को 
मोहलत की अलगनी पर छोड़ देना 
स्वयं को 
परिस्थिति से बहलाना भर ही तो है 

शब्द 
होते बावरे 
अपनी मर्जी के मालिक 
थोड़ी सी ढील 
में फिसल जाते रेत की तरह 

शब्द
छोड़ते ही हाथ 
उड़ जाते आवारा बादल बन 
और ये बादल 
बरस जाते फिर कहीं और 
तुम्हारे आँगन में 
रह जाती केवल तपिश उनकी

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Friday, October 10, 2014

पेंडुलम सी जिन्दगी

पेंडुलम की टिक टिक सी दिल की धड़कन और ख़ामोशी के सायें हाँ शांति है चहुँ ओर सन्नाटे की चादर ताने
शांति जानते हो कैसी ? तूफ़ान के पहले सी जाने कब लहरे आवेग में खो दे अपना संतुलन मौसम बिगड़ जाए काले काले बादल घिर आये और बरस जाए
लेकिन ये बारिश तपन देती है इस तपन से गरमा जाता है माहौल सारा चुभता कुछ फांस सा पीड़ा का एहसास बेचैनी भर जाता अंतस में
इसी ओह्पोह की हालत में मन को समझाने का निरर्थक सा प्रयास है जीवन कभी समझ पाता मन और कभी रह जाता बहुत कुछ उलझा हुआ
बस ऐसे ही चलती है जिन्दगी कभी मुस्कुराहट में अपनी पीड़ा को सहेजती कभी बेचैनी छू जाती सांसों को उसकी
फिर अगले ही पल सारी परेशानियों को सहेज कर रख देती वो एक आले में और निकल पड़ती खुद से बतियाती मुस्कुराती खो जाती है खुद में ही कहीं
बिताती खुद के साथ कुछ समय वो ऐसे ही जैसे अज्ञातवास में हो आत्मा के साथ चिंतन के वो पल गुनते बुनते बहुत कुछ टूटता बिखरता जुड़ता आकार लेता उसके भीतर नया कुछ
और फिर लौट आते है कदम उसके दिवास्वप्न में डूबी तंद्रा के भंग होने पर जैसे भान होता यथार्थ के कठोर धरातल से टकराने का वैसे ही कदम उसके रिश्तों की डोर से बंधे लौट आते वापिस उसी राह पर जो राह जाती उसके जहान तक
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Wednesday, September 10, 2014

नग्न सत्य

एक नग्न सत्य
जो ढांपने को आतुर
बुद्धि और तर्कों के आवरण से
स्वयं को
स्त्री केवल एक शरीर
उभारों से परिपूर्ण
जिसकी चाल में शोखी
आँखों में मस्ती
और बातों में रस है टपकता
आँखों की भूख
जो निगलने को आतुर
कभी बातों से कभी हाथों से
और कभी बलात्कार से
होती तृप्त अतृप्त कुंठाए
विकृत घिनौनी मानसिकताएं
वासना की आग चाहती आहुति
छप्पन भोग सा हो जाता एक शरीर
भोग को आधुनिकता का जामा पहना
स्त्री जो मात्र एक शरीर है
उसका भरपूर उपयोग है किया जाता
और फिर फेंक दिया जाता कूड़ेदान में
कहीं कचरे समान
और हैरत ये सारे उपकर्म में
खड़ी होती स्त्री ही कटघरे में ......
क्यों गई सुनसान रस्ते पर?
क्यों पहने तंग कपडे?
क्यों निडर बनने का किया दुस्साहस ?
जाने कितने क्यों घेर चीखते उसे
हर तरफ से सिर्फ कोलाहल शोर
और चीखें है सुनाई देती
और वो कान बंद कर अपने
बैठ जाती घुटनों के बल
सिसकती कराहती सी
अपने नारी होने पर ग्लानि करती
अपनी पीढ़ा को टांगों में भींच
उससे निजात पाने का निरर्थक सा प्रयास करती
और वासना से रक्तिम आंखें
अठ्ठास करती फिर जुट जाती खोजने
एक नया शिकार खोज जारी है
और सच
बुद्धि और तर्कों का आवरण ओढ़े गहन निद्रा में लीन है
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Tuesday, September 9, 2014

बातें सीली सी

आंखें हाँ आंखें
कह जाती सब
अच्छा बुरा झूठ सच
कभी हंसकर कभी बहकर
कहना उनका होता सार्थक
जब समझ होती परिपक्व
भांप लेती झांक लेती शब्दों से परे
बेंधती असमंजस के मकड़जाल को.......

वर्ना तो आँखों की अथाह गहराइयों में
डूब जाती अनगिनत बातें
जो खो देती अपना अस्तित्व
आँखों के सागर में गोते लगाती
डूब जाती थककर पैठ जाती
तलहठी में कहीं
सीले से काई से सने
किसी कोने को थाम.......
 
समय के गर्भ में सिसकती निरंतर
जब पीढ़ा उनकी हो जाती असहनीय
तो रिसने लगती पीब सी
आँखों के कोरों से लेकिन कसक उनकी
कहाँ लेने देती है चैन
वो तो नासूर बन टीस लिए कराहती
उम्र भर आँखों के पथराने के इंतज़ार में.......
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Thursday, August 21, 2014

साझेदारी

बीते समय की है बातें
भूले बिसरे से है फ़साने
ख़ुशी और गम होते थे
साझा से
सांझी होती थी छत
एक रसोई की खुशबू से
महकता था
दूजे घर का आँगन
पडोसी की ख़ुशी से
थिरकते थे कदम जहाँ
उनके गम से
नम हो जाते थे
दिल के जज़्बात भी ........

आज भी होती है साझेदारी
फर्क फ़कत इतना है
पडोसी की ख़ुशी
दे जाती है
गम के काले साये
अमावस की रात से
कुछ बेचैनी साँसों को
और गम उसका
कर जाता है रोशन
आँखों के टिमटिमाते से दीये......

आधुनिकता का जामा पहने
गरूर से नैन मटकाती सी
साझेदारी
दंभ से कहती
दस्तूर निभा रही
मैं भी जमाने का
रास आ ही गया
हुनर मुझे
मुखौटें लगा चेहरे पर
नित नए मुस्कुराने का
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Wednesday, August 6, 2014

जाने क्यों ?

जाने क्यों ?

साँझा होती है खुशियाँ
हर दिल पर असर करती है
बादलों की ओट से निकल
जैसे तारें चमकते
नील गगन पर
रोशन हो जाती है
अमावस की स्याह रात भी
जुगनुओं के टिमटिमाने से  
ऐसे ही खुशियों दिल में बसर करती है

खुशियाँ बिखर जाती है
मन के आंगन में
रात की रानी के
फूलों की महक सी
उस महक से हो आकर्षित
हर मन भंवरे सा खीचा चला आता है
समेट लेना चाहता है
अपने अंतस में खुशबु का कुछ अंश
जैसे भंवरा फूल को चाहता है

लेकिन जब बात गम की आती है
गम तन्हा सा
बिसरता नज़र आता है
ठोकरों की नज़र हुआ जाता है
बैठ किसी सुनसान कोठरी में कहीं
सिसकियों को सहलाता है
नम आँखों में बसर करता है
भीगे होंटों पर मुस्कुराता है

हर नज़र गम से कतराती है
बचा दामन अपना
नज़रें चुरा कर निकल जाती है
हाथ छूट जाते है
हाथों से कुछ यूँ
जैसे रेत बंद मुठ्ठी से सरक जाती है
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Thursday, July 3, 2014

ग़ज़ल

होता है कभी ऐसा भी ज़माने में
ग़ुम जाती है हस्तियां तहखाने में! 


टूटता है भ्रम जब किसी आशिक़ का
सिसकता है दिल पड़ा मैखाने में ! 


इन हसीनो से कह दो कि ना इतराए इतना
क्यूं आता है मज़ा आशिक़ों को तडपाने मे!



मुहब्बत में जब भी रूठता है कोई
है अपना ही मज़ा रूठे को मनाने में ! 


मृगतृष्णा सी है तपिश दिल के भरमाने में
कट ना जाए उम्र युहीं आने जाने में ! 


ये इश्क़ का जूनून है कोई सौदा नहीँ यारों
टूट जाते हैं दिल आजमाइशों के पैमाने में !

Wednesday, April 30, 2014

भटकन

भटकन मन की
ला पटकती है
इंसान को वीराने में
गहन अंधियारा
जहाँ हाथ को हाथ ना सूझे
और आँख को सूझे ना राह 
खोता वजूद है जीवन 
कोई हाथ ना थामे बाहं
और सन्नाटा
स्याह अँधेरे की चादर ओढे
मौन के मूक रुदन को
सहेजता और
बिखेर देता करुण विलाप
चहुँ और ख़ामोशी के साथ
मन अनजानी कसक सहेजे  
भटकती हुई
अतृप्त सी प्यास लिए
किसी सुकून की तलाश में
ख्व़ाब सजोयें सपनीली आँखों में
भटकता इन्ही विरानो में
वियाबानों में
वजूद को तलाशता सा
लेकिन नियति में
भटकन उसने  खुद ही लिखी
भटकता बिसूरता निरंतर
जीवन सत्य से अनजान
जीवन जो कर्मो से बंधा
और कर्म करते निर्धारण
नियति के चक्र का
आह अज्ञानी
आज देता जो
रिश्तों की दुहाई
वो मन क्या
समझ पाया
प्रेम और विश्वास है क्या ?
खिलवाड़ हाँ
यहीं तो किया
उसने ताउम्र
सहजता सरलता को
ढाल बना
छलता आया वो
छलिया मन
निश्चलता को
वो कहता आसमयिक है
नहीं ये तो होना तय था
क्युकि चेहरों के नकाब
उतरना है निश्चित
रिश्तों का हल्कापन
फरेब का मुल्लमा
चढ़े चेहरों का सच
कब छिपा आईने से ?
रिश्तों को पाने की चाह
इस रिश्ते से उस रिश्ते तक
दौड़ एक अंधी सी
सघन अंधियारे में
ठोकरे खाती सी
चीखती चिल्लाती सी
खुश होता अपनी
होशियारी पर जब
पैठ बना लेता
किसी अबोध मन में
अपनेपन का जाल बिछा
छलिया मन  
और मन जो निश्छल सा
मान उसे अपना करता
आँख बंद भरोसा
उसकी हर बात पर
उसकी जात पर
लेकिन यथार्थ का धरातल
होता हमेशा सख्त कठोर
होते ही उससे सामना
आह व्यथा से भर जाता
यकीन मन का दरकता
टूट कर बिखर जाता
कांच सा और किरचे उसकी
करती लहुलुहान रूह को
दूसरी और मन जो
भरोसे की डोर है थामता
नहीं होता है निर्बल
सबक लेकर बढ़ता आगे वो
और कहता
सुनो ए भटके हुए मन
तुम नहीं कर सकते हो
परास्त
आस को विश्वास को
एहसासों को और रिश्तों को
छल और कपट से
जाओ तुम भोगों
अपनी हिस्से की
ये तपिश
ये भटकन
और हाँ ये छटपटाहट
फल है तुम्हारी ही
भटकन का
व्यर्थ खोखली रीती सी
चाहनाओं से ही
तो है निर्मित
मृगतृष्णा सी ये प्यास तुम्हारी 
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