Friday, December 6, 2013

तुम्हारे लिए

सुनो मैं छोड़ आई हूँ
पास तुम्हारे
एहसासों की तपिश
प्रेम की खुशबू
स्पर्श और छुअन
सिरहाने रख आई हूँ
कुछ हिदायते
सर्द सी ठिठुरती
कुछ बेचैनी
और कुनकुनी धूप सी
कुछ मुस्कुराहटें
पलंग की चादर से बाँध आई हूँ
कुछ यादें
और कंबल में सहेज रख आई हूँ
मीठी सी दुआ
बालकनी से झांकता छोड़ आई हूँ
इंतज़ार को
लौट तो आई हूँ मैं पर लगता है
जैसे खुद को ही छोड़ आई हूँ
पास तुम्हारे
महसूस करना हूँ हर पल
साथ तुम्हारे
महकती चहकती मुस्कुराती सी
हाँ तुम्हारी ही किरण
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Friday, November 29, 2013

उजास

स्तब्ध हर सांस है
रो रहा आकाश है
हर तरफ विनाश है
मानवता का ह्रास है !

सिसकते एहसास है
क्या ये विकास है ?
या सृष्टि का नाश है
देवों का जहाँ वास है
अब वहां विनाश है !

महत्वाकांक्षा की खाज़ है
रो रहा आह मधुमास है
मानुष तन जो खास है
रक्त रंजित सा मॉस है !

प्राण अब निश्वास है
भटकती सी प्यास है
अँधेरे जो बेआवाज़ है
मन के आस पास है !

फिर भी मन में विश्वास है
आने वाली सुबह एक उजास है
दीये सी झिमिलाती आस है
आँखों में चमकता प्रकाश है

होंटों पर निश्छल सा सुहास है
मन की ये अडिग आवाज़ है
जहाँ आस है जिंदगी में मिठास है
मधुर जो मिठास है सबसे खास है !!

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Thursday, November 14, 2013

मन की आहट

सुनो ए मन मेरे 
एक रिश्ता है दरमियाँ मेरे और तेरे
उम्र के पड़ाव रिश्तों की खराश से परे
अभी तक जाना है मैंने तेरे
खिलखिलाते ठहाकों को जो
ख़ुशगवार झोंके से छूकर गुजर जाते
मेरे चेहरें पर गिरे गेसुओं को
प्रेम से स्निग्ध भावों को
जो तेरे अपने होने का भान करा जाते
बड़ी शिद्दत से मुझे
और सहला जाते मेरी उदासी को
तुम कहते हो मत कहलवाओ मुझसे
वह जो मैं कहना नहीं चाहता
बहुत कुछ आहटों से समझा करो
जिस दिन आहटों को
समझना सीख जाओगी
उस दिन कहने सुनने को
कुछ ना रहेगा शेष दरमियाँ हमारे
मूक बैठकर दूर रहकर भी
कर पायेंगे हर पहर हम
बातें अनगिनत बातें
बातें जो मैं बुनूं तुम समझ पाओ
बातें जो जोड़ेंगी हमें कुछ इस तरह
लगने लगूंगा तुम्हारा ही हिस्सा मैं
इसीलिए ए मन सीख रही हूँ मैं
महसूस करना पहचानना
एहसासों की आहट
उसके पदचापों की दस्तक
सुगबुगाते से एहसास
झिझक की परिधि में
जकड़े मूक से भाव
लेते अंगड़ाई स्वप्निल सी आँखों में
झिलमिलाते दीपों की बाती में
झांकते मेरी बड़ी बड़ी आखों में
मानो पूछ रहे हो मुझसे वो
सुनो पहचाना हमें
समझ रही हो ना तुम आहट हमारी

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Thursday, November 7, 2013

गुरूर

सफलता आसमान पर
बिठा देती है इंसान को
मन लेता है हिलोरे
चाहतें है कहती
आसमां तू छू ले
अमृत मंथन में मिला
जैसे अमृत संग विष भी
उसी तरह सफलता देती है
नाम शौर्य के साथ
गुरुर अभिमान भी
सफ़लता की हर पायदान को
चूमते कदम गर हो दृढ़
तो रहता है मन
यथार्थ धरातल से जुड़ा
उसी पर टिका
सहज सरल सा
लेकिन जरा सी लापरवाही
उड़ने लगता है जीव गगन में
छूने लगता चाँद और सितारे
और फिर ठोस धरातल
रह जाता दूर धूमिल होता
हो जाता ओझल नज़रों से
चकाचौंध चुंधिया देती आँखों को
और गुरुर का चश्मा
चढ़ जाता सपनीली आँखों पर
उंचाई पर पहुचने का नशा
और उसकी लत
इंसा भी ना रहने देती
पतन को कर अनदेखा
छोड़ सबको पीछे
आगे बढ़ जाने की लालसा
विशालकाय सर्प सी कुंडली
कसती अपना घेरा
सब लगता क्षुद्र सा
और अहम् सर
चढ़कर है बोलता
केवल मैं ही रह जाता करीब
और बाकी सब जाता पीछे छूट
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Monday, October 28, 2013

फितरत

बदलना समय की मांग है 
फितरत भी है जमाने की 
रुत बदलती है 
समय है बदलता यहाँ
हवाओं की आवाज़ाही से 
मौसम बदल जाते है 
क्या कहिये जनाब 
वक़्त की आंधी का असर 
यहाँ तो पल में 
रिश्ते बदल जाते है 
मुखोटों चढ़े है चेहरे यहाँ 
पीठ घूमी नहीं जरा 
हाय खंजर निकल जाते है 
बेगैरत हो गई है संवेदनाये 
कुछ इस कदर 
आँख फिर जाती है और 
इंसान बदल जाते है 
रूह में बसने के जो 
करते थे दावे यहाँ 
पल भर में ही वो 
दिल बदल जाते है 
स्वार्थों की बेदी 
मतलब परस्ती ये हाय 
अंधी दौड़ ज़माने की 
अपने ही जाने हाय
इस दौड़ में कब 
दूर निकल जाते है 
निभा रहे सब दस्तूर 
बेदर्द इस जमाने का 
फिर क्यों सोचकर ये सब 
आँख से आंसू निकल जाते है 
बदलना तो ज़माने की फितरत है 
शायद इसीलिए जज़्बात पिघलकर 
आड़े -तिरछे शब्दों में ढल जाते है
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Friday, October 18, 2013

हर्फ़

मन की किताब हर हर्फ़ 
हाथ की लकीर सा 
लेता आक़ार 
हर पन्ने से जीवंत हो एहसास 
पंख लगा लगते है 
उड़ने पंछी से 
अंनत का आकर्षण 
उसका मोहपाश 
खीच रहा जैसे उन्हें अपनी ही ओर 
हर्फ़ों का भी होता 
अपना ही जहां 
 जहाँ विचरते स्वच्छंद 
वो यहाँ वहां 
कुछ हर्फ़ कशमकश में 
डूबते उतरते 
बौराई लालसाओं से 
भटकते दौड़ते 
निरंतर शून्य में दौड़ते 
वैसे ही जैसे एक भ्रूण 
अपने अस्तित्व की 
अंधी दौड़ में दौड़ता सरपट 
चाह प्रथम आने की 
वजूद के स्थायित्व को वरने की 
कुछ शब्द क्लांत से 
अपने में गुम अनमने से 
कोई कोना ढूंढते सीला सा 
जहाँ वो पा सके पनाह 
कुछ शब्द ऐसे भी 
जो मुस्कान है समेटे 
अपने आँचल में 
हँसते खिलखिलाते 
और आँखों में बस है जाते 
सुनहरे स्वप्न से 
और इस तरह मन की किताब 
उसका हर हर्फ़ 
सहलाता दुलारता हँसता रुलाता 
कभी उदासी से भर जाता 
लेकिन फिर भी हर शब्द 
मन की किताब में 
पनाह पा ही जाता ..........है ना

Wednesday, October 9, 2013

भूख

हमारी ये भूख
साम्प्रदायिक नहीं है
यह है पूरी तरह से
धर्मनिरपेक्ष।

यह नहीं देखती
हिन्दू ना मुस्लिम
ना सिख ना इसाई।
यह खंज़र लेकर हाथ में
खड़ी भी नहीं होती
बस महसूस करती है
अंतड़ियों के दर्द को
हमारी ये भूख

गरीब के सपने सी
अमीर की शोहरत सी
कभी रोती कभी हंसती
हमारी ये भूख।

चोर के ज़मीर सी
आटे में ख़मीर सी
शिकारी के तीर सी
बस चुभती भर है
हमारी ये भूख।

वेश्या की पायल में
 बिछड़े हुए बादल में
माँ के सूने आँचल में
बिलखती सी
हमारी ये भूख

तन को कभी लजाये
नयन नीर सी गिर जाये
मन इधर उधर भटकाए
निर्लज्ज बेहया सी
हमारी ये भूख

आँखों के सूखे कोर सी
बेगानों के ठौर सी
छुप रही चोर सी
बहकती फिरे
हमारी ये भूख

सरिता में बहते नीर सी
पके फफोलों की पीर सी
अपनों पर गिरती शमसीर सी
निरंतर रिसती
हमारी ये भूख
भूख ये भूख
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Thursday, September 26, 2013

सिर्फ तुम



मुठ्ठी मेरी निरंतर कसती
और रेत के मानिंद
फिसलते तुम
मुठ्ठी खोल पाने की
जद्दोजहद आह
चहुँ ओर नीरवता का
सघन कुहास
तुम्हारा अहम् विस्तृत होता
उसका घेरा
ऑक्टोपस की भुजाओं सा
और छोटा होता मेरा वजूद
मोम सा है पिघल रहा
सागर की लहरों से आकर
हृदय कपाट पर बिना
दस्तक दिए लौटते कदम तुम्हारे
और झिझक मेरी
बेड़ियों सी कसती शिकंजा अपना
बोझिल सी हवा
दमघोटू माहौल बिखरती सांसे
भीगता सा वजूद
लेकिन मन में टिमटिमाता है
आस का एक दीप
और उसकी लों कर रही है
मन उजियारा
भर रही है रूह में उजास
गर्भ में विकसित होते शिशु सा
कोमल स्नेह स्निग्ध विश्वास
कि लौट कर आओगे
मेरे ही दामन में
तुम एक दिन
भटकती मृगतृष्णा सी
अतृप्त प्यास लिए
और पा जाओगे 
निजात भटकन से जो
दौडती है गलियों में
बौराई लड़की सी चीखती
उस दिन मिलेगी राह
इंतज़ार को मेरे
श्वास को मेरी मिलेंगे नवप्राण
इस सोच के साथ ही
देखो खुल रही है कसती मुठ्ठी
और मुस्कुरा रहे हो
मेरी हथेली में
लकीरों से तुम हाँ सिर्फ तुम 

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Friday, September 6, 2013

गुनाह

खबर हाँ खबर
रोज़ बहुत सी ख़बरों संग
होती है शुरुवात दिन की
कुछ खबर कर देती
मन खट्टा .......

ऐसे ही एक खबर
दिल को छलनी कर गई
मात्र छः साल की वो मासूम
सहमी सी थी कटघरे में खड़ी
कसूर या महापाप ......

उसका फ़कत इतना ही
अमरुद जो था उसके
नन्हें सुकोमल हाथों में था
उसने तोड़ा उसे
पड़ोस के घर से ही ......

पहले का समय आह
पड़ोसी सुख-दुःख के साथ
खाना पीना मिठास
अपने घर की करते थे साझा
आज देखो तो हाय
शनि की कुटिल महादशा ......

चंद अमरुद तोड़ना
बन गया उसका गुनाह
आह मूंह का स्वाद
कसैला सा क्यों
जाने हो चला .....

संवेदनायें हैं मर रही
मानवता है दम तोड़ती
आह पीड़ा ह्रदय की
मूक पीब से भरी ......

सोच निज में सिमटती
वेदना बधिर है हो गई
सकुंचित हो रहा हृदय
आधुनिकता हो रही हावी
मन अपने में है राज़ी .......

दिल करे पैरवी खुद की
हो गया बेमुरव्वत ये पाजी
खुद ही बन गया है देखो
वकील कह लो इसे या क़ाज़ी .....

वक़्त की बेदिली से यारों
दिल है अपना भर गया
संवेदन हीन हुआ मानुष
निज में है सिमट रहा
स्वार्थ हो रहा है हावी
गर्त में है गिर रहा ......

Saturday, August 31, 2013

बिखरते अहसास

तुमने कहा प्यार मुझे तुमसे
मैं भीग उठी मीठे अहसासों में
सपने रुपहले लगी बुनने
कदम आसमां लगे छूने

नयनों में लहराने लगे
लाल रक्तिम डोरे 
 
प्रेम की पीग बढ़ाती मैं
विचरने लगी चांदनी से
नहाई रातों में
भोर की पहली किरण सी
चमकने लगी देह 

 
प्रेम तुम्हारा
ओढ़ने बिछाने लगी मैं

जीवन हो गया सुवासित
होने लगा उससे प्यार
फिर यथार्थ का कठोर धरातल
कैक्टस सी जमीं
लहुलुहान होते सपने बिखरी सी मैं

पर सुकूं तू हाथ थामे था खडा
वक़्त के निर्मम थपेड़े
उनकी मार देह और आत्मा पर
निशां छोडती अमिट से
मरहम सा सपर्श तेरा
रूह को देता था क़रार 

 
फिर एक दिन तुमने कहा
मुक्ति दे दो मुझे
नहीं मिला सकता
कदम से कदम
नहीं बन सकता अब
हमकदम हमसफ़र तेरा 

 
मुश्किल थे वो पल
दुरूह से मेरे लिए
तुम्हारे दूर जाने की सोच ही
दहला देती थी हृदय को
मैंने देखी बेचैनी
तुम्हारी आँखों में
तड़पती मछली सी कसक 

 
और उसी क्षण मुठ्ठी से
फिसलती रेत सा
कर दिया था आज़ाद तुम्हे
तुम दूर होते गए
और फिर हो ओझल
निगाहों से मेरी 

 
आज जब याद करती तुम्हे
एक परछाई सी
नज़र आती है बस

हाँ अहसास जीवंत से है
अब
साथी मेरे
जिन्होंने जीना सिखाया मुझे 
       ****************

Tuesday, August 27, 2013

आधुनिकता की आंधी

विशाल ने कल एक चित्र के साथ हास्य रचना पोस्ट की .....उस चित्र को देखकर हंसी के साथ जेहन में आये ये भाव आप सभी मित्रो की नज़र ......आशा है आपको पसंद आयेंगे ......

आधुनिकता की बही अब कुछ ऐसी आंधी
गर्भ में ही बन गए शिशु फेसबुक के आदी

राजधानी एक्सप्रेस है भया मानव अंधी दौड़
भ्रूण से ही शुरू हुई अस्तित्व पाने की ये हौड

अंधी दौड़ जीवन की अफरातफरी है चहुँ ओर
संवेदनाये मर रही संस्कृति रही है दम तोड़

डिजिटल अब दुनिया भई नेट मोबाइल का जोर
फेसबुक ट्विटर मन ललचाये नाचे मन का मोर

शांति हॉस्पिटल है जा रही चिंतित जियरा पुरजोर
फेसबुक ना खोलने पाने की पीड़ा प्रसव से भी घोर

शिशु की चुप्पी से थी वो घबराई जैसे कोई ढोर
आज सुबह से ना हलचल थी ना था कोई शोर

अल्ट्रासाउंड टेबल पर लेटी गुमसुम मूह को मोड़
देखा जैसे ही शुशु को झटका लगा उसे अति जोर

लैपटॉप संग व्यस्त नवजात फेसबुक करत है चोर
देख नौनिहाल की ऐसी छवि माता भई भावविभोर

व्यस्त रहूंगी मैं ऍफ़ बी पर लैपटॉप पर होगा मेरा चकोर
बैठ दोनों करेंगे अपनी-२ सेटिंग छू लेंगे आसमान के छोर

नाम करेगा रौशन किशन कन्हाई मेरा ये चितचोर
आधुनिकता की दौड़ में अव्वल, होगा मेरा नन्द किशोर

*****************

Sunday, August 25, 2013

बातूनी

हां औरत होती ही है बातूनी
खुद से ही बातें करती अक्सर
वो बुनती है गुनती है
टूटे से ख्व़ाब बिखरे से शब्द
पहले बोलती थी उसकी आंखें
अनकहा सब बह जाता था
निर्झर बहते आसुओं संग
फिर सूखने लगे आँखों के कोर
और साथ ही मन के भाव भी....

अब वो बुनती है गुनती है
मन की वेदना घुटी सी चीत्कार
उसका खुद से
बातें करने का सिलसिला
तीव्र होने लगी है उसकी गति
अब अक्सर खुद से बातें करती
नज़र आती है वो....

वो बुनती है गुनती है
चातक सी प्यास तन की सिलवटें
देह की मृगतृष्णा भटकाती उसे
क्षणिक चमक भरमाती उसे
ढूंढती उसमें वो तृप्ति
लेकिन तोड़ ये मकड़जाल संभलती वो.....

वो बुनती है गुनती है
मन का अंतर्द्वंद और आत्मचिंतन
जो ले जाता उसे अनंत की ओर
खींचता बरबस अपनी ओर
कुछ निर्भय और आश्वस्त होती
अपने बिखरे वजूद को बटोरती वो....

वो बुनती है गुनती है
मन की रिक्तता मरु सी तपिश
अब खटकते नहीं सपने
उसकी आखों में हाँ आंखें उसकी
जो स्व्प्नीली थी कभी
फिर से जीवंत नज़र है आने लगी वो.....

अब बुनती है गुनती है
मन के गीत मीठा सा संगीत
जो सुकून दे जाता है उसे
खुद से बातें करने का सिलसिला
अब हो गया है अनवरत सा
हर पल बुदबुदाती गुनगुनाती वो
लिखती कभी पीड़ा कभी जीवन के गीत .....

हाँ बुनती है गुनती है
वो अब हरसिंगार की खुशबू
मीठे से अहसास
बातें करना खुद से रास आने लगा उसे
अब क्योंकि मिल गया जरिया उसे
अपनी पीड़ा रिक्तता ख़ुशी ग़म
हर भाव को शब्दों में उकेरने का...

अब वो बुनती है गुनती है
कलकल सी हंसी मुस्कुराते भाव
हाँ नारी होती है बातूनी
खुद से करती है बातें हर पल ........

Thursday, August 1, 2013

व्यस्त सी है जिंदगी
हिस्सों में बँटी हुई
सिरे परस्पर उलझे से
रेत से फिसल रहे ....
 
सागर की लहरों सी 
शोर संग विकल बढ़ी
शिलाओं के नगर में
टूटी हुई सांस सी .....
 
है कभी मधुमास सी
पिया मिलन की आस लिए 
चाहतों के घरौंदे में
मधुर से अहसास सी ....
 
चक्की के पाटों में फंसी
पिस रही बेबस बड़ी
सूखे से कोर में
अश्रु की बरसात सी .....
 
अनबुझी प्यास सी
रूह की भटकन लिए
नीरवता के सघन में
उड़ रही खाक सी ......
 
सन्नाटो का है उपद्रव
मौन एक रुदन लिए
मरघट से शहर में
मृत्यु के संताप सी .....
 
व्यस्त सी है जिंदगी
हास सी परिहास सी
मुस्कानों के मेलें में
अपनों के साथ सी.......

Monday, July 22, 2013

चाँद हाँ जो प्रतीक है
प्रेम और सौन्दर्य का
इंसा ने श्रृंगार रस से सजा
जोड़े इससे भाव
बच्चो ने मामा कहा
जोड़े नेह संग ख्वाब ..........

चांदनी इसकी प्रेमियों को
रही रिझाती
अमावस के चाँद सी
विरह नहीं है भाती
चाँद को पाना जुस्तजू
प्रेमी ह्रदय सजाती........

आज फिर मानुष मन में है
इक हुक उठी
चाँद पे घर बसाने की चाह
आज मन बसी.......

प्रकृति और पृथ्वी से
कर खिलवाड़ वो हारा
अब लालसाओ ने उसकी 
चाँद को है निहारा..........

क्या समझ पायेगा अब भी
बावरा सा इंसान
या इच्छाए लील लेंगी उसकी 
सौन्दर्य प्रकृति का ..........


Sunday, March 10, 2013

भूर्ण हत्या और धरहरा की धरोहर

कन्या भूर्ण हत्या आज के समय में एक ज्वलंत समस्या है आज चाहे हमने कितनी भी तरक्की क्यों ना कर ली हो लेकिन हमारी मानसिकता आज भी स्त्री पुरुष लिंग भेद से उप्पर नहीं उठ पाई है आज भी लड़के के होने पर खुशियाँ मनाई जाती है, और कन्या भूर्ण हत्या को सरंजाम दिया जाता है कुछ राज्यों में तो कन्या भूर्ण हत्या के चलते स्थिती यह है कि लडकियो की संख्या इतनी कम हो गई है कि वहां लडको की शादी के लिए लडकिया खरीदी जाती है जिन्हें बहला फूलसा के दूसरे राज्यों से लाया जाता है और बेच दिया जाता है और उन्हें ऐसे परिवेश में रहने को बाध्य होना पड़ता है जहाँ की भाषा और रहन सहन से वो पूरी तरह अनभिज्ञ होती है और इस तरह से वहां जिस्म फरोशी का बाज़ार सरेआम चलता है, आज भी छोटे शहरो और गावों में ही नहीं अपितु महानगरो में भी लडकियो को भेद भाव की पीड़ा और इससे जुडी अनेको समस्याओ को वहन करना पड़ रहा है चाहे अनचाहे! 
वहीँ दूसरी तरफ भागलपुर जिले के नवगछिया से सटे गोपालपुर प्रखंड का एक छोटा सा गाँव है धरहरा,जो पटना से पूर्व में 230 किलोमीटर की दूरी पर है, वहां बेटियो के जन्म पर पेड़ लगाकर बेटी के होने के उत्सव को मनाया जाता है! यह एक सदियों पुरानी प्रथा है.कोई नहीं जानता कि इसकी शुरुआत कब और कैसे हुई.  वहां 1961 में निर्मला देवी जी ने जब एक बेटी को जन्म दिया तो उनके पति ने 50 आम के पेड़ लगाकर जन्मोत्सव मनाया,उनकी दूसरी पुत्री के जन्म के बाद तथा बाद में पोतियों के जन्म का उत्सव पेड़ लगाकर मनाया गया,आज निर्मला देवी के पास आम और लीची का 10 एकड़ का बगीचा है! शायद यहाँ से इस प्रथा का शुभ आरम्भ हुआ होगा तब से अमीर हों या गरीब,उच्च जाति के हों या निम्न जाति के सभी लोग बेटी के जन्म पर पेड़ जरुर लगाते हैं,बेटी का जन्मोत्सव यहाँ पर कम से कम 10 फलदार पेड़ लगाकर मनाया जाता है और बेटी को लक्ष्मी का अवतार माना जाता है! हरियाली से ओत-प्रोत धरहरा गाँव दक्षिण में गंगा से और उत्तर पूर्व में कोसी नदी से घिरा है. धरहरा की बेटियां गर्व से अपने आपको हरित क्रांति की पक्षधर कहलाना पसंद करती हैं! 2010 में यह गाँव तब प्रकाश में आया जब लोगों को पता चला कि एक परिवार बेटी के जन्म पर कम से कम 10 पौधे जरुर लगाते हैं. पेड़ लगाने की यह प्रथा कई पीढ़ियों से जारी है. 2010 में 7000 की जनसँख्या वाले इस गाँव में लगभग एक लाख पेड़ थे,ज्यादातर आम और लीची के! 1200 एकड़ क्षेत्रफल वाले इस गाँव में 400 एकड़ क्षेत्र में फलदार पेड़ लगे हैं, इस गाँव में स्त्रियों और पुरुषों का अनुपात 1000 :871 है. पर्यावरण को हरा भरा,साफ़ सुथरा और बीमारियों से परे रखने के अलावा यह प्रथा बेटियों का एक तरह से बीमा कवर का कार्य करती है,शहरों में लोग जिस तरह बेटियों की शिक्षा,विवाह आदि के लिए रुपया जमा करते हैं वहीँ धरहरा में लोग फलदार पेड़ लगाते हैं! भारत जैसे देश में जहाँ कन्या भ्रूण हत्या और दहेज़ हत्या चरम पर है,इस तरह की प्रथा अवश्य ही प्रशंसनीय है, महिला सशक्तिकरण की दिशा में यह अद्भुत कदम है, यहाँ की वनपुत्रियाँ ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओ से भी जागरूक होने का सन्देश देती है! एक तरफ हम स्त्री को माँ दुर्गे और माँ अम्बे के रूप में पूजते है, लेकिन व्यवहार में हम ऐसा नहीं करते! ठीक यही स्थिति पेड़ों को लेकर है, पेड़ों की पूजा की जाती है लेकिन जब आवश्यकता आस्था पर भारी पड़ने लगती है तो पेड़ों को काट देते है बिना सोचे समझे आज शहरो में पेड़ देखने को नहीं मिलते हरियाली कि जगह बड़ी बड़ी इमारतों ने ले ली है, ऐसे में धरहरा के लोगों ने एक बड़ा सन्देश दिया है, धरहरा से निकला बेटियों के नाम पर पेड़ लगाने का सन्देश आज देश भर में गूंज रहा है, इस बार गणतंत्र दिवस के अवसर पर बिहार राज्य कि झांकी में धरहरा कि इसी परंपरा को दर्शाया गया जो देश के दूसरे गांवों के लोगों को भी प्रेरित करेगी साथ ही कन्या भ्रूण हत्या और उससे जुडी समस्याओ से निजात का सन्देश भी देगी और इसके साथ पर्यावरण को हरित क्रांति की और भी उद्धत करेगी..........

Thursday, March 7, 2013

रीति का निर्वाह

मस्तिष्क की शुन्यता में विचरती वो
भावशून्य सी देख रही थी इकटक वो
जो पार्थिव शरीर श्वेत कपड़े में था
उसके सामने और कर रही थी प्रयास
निरंतर उसे पहचानने का ...........

आस पास रिश्तेदारों और पड़ोसने बैठी थी
विलाप का इक स्वर उसके कानो से टकरा रहा था
तभी किसी ने झकझोर कर उसे कहा की रो ले शांति
थोडा सा रोने से मन हल्का हो जायेगा
और वो सोच रही थी की थोडा सा रोने से
इतने सालो का गुबार राह पायेगा क्या मन का??

उसका पति हमेशा इक मानुष खोजती रही वो उसमे
लेकिन उसे केवल इक दरिंदा ही नज़र आया उसमे
शराब के नशे में धुत वो लाल आँखें
अब तो घर कर चुकी है उसके अंतस में .......

आंतरिक क्षणों में भी उसने स्त्रीत्व को पाने की बहुत चेष्टा की
लेकिन इक भोग्या से अधिक ना बन पाई वो कभी
और वो इक दरिन्दे की तरह अपनी पिपासा शांत होने तक
निरंतर नोचता रहा उसकी आत्मा को ........

हमेशा दुत्कार गाली और मार ही तो आई उसके हिस्से में
इसी तरह चलती रही जिंदगी अपने प्रवाह के साथ गतिमान सी
और उसके संग वो भी कभी लडखडाती कभी हारती
हर बार खुद को समेट कर चलती ..............

हाँ हर साल इक बच्चा सौगात रूप में उसका आँचल सजाता रहा
मन की कटुता उसे पाषाण बनाती गई
और भाव उसके मन के सब सूखते चले गए
सुनती आई थी वो कि पति देवता होता है
लेकिन उसका मन क्या मान पाया उस व्यक्ति को कभी देवता ??

आज जब पड़ा है उसका मृत शरीर तो पुराने जख्म
जो उसकी रूह को कुरचते ताज़ा होने लगे
और चीत्कार उठी वो और साथ ही
दो बूँद आसूं ढुलक आये उसके गालो पर .........

सबने राहत की सांस ली की हो गया कर्तव्य का निर्वाह
और स्त्रियों ने फिर से इक बार विलाप शुरू किया
इस शोर के बीच सोच रही वो अभी भी ये
उसके सब्र को राह मिली उसके आंसू है
या रीति का निर्वाह उसने है किया .............किरण आर्य