Thursday, September 8, 2016

अबोल

कहना बेतरतीब सा, आक्रोशित सा, अवसाद में डूबा सा, या फिर सघन अंधियारों में बेतहाशा दौड़ता पसीने की दुर्गंध में सना, चीखने को आतुर लेकिन चीख उसकी गले में ही घुट दम तोड़ती, फिर भी आंखें कहने को लालायित और न कह पाने की पीड़ा पिघलकर आँखों में सागर के होने के भ्रम को कसकर पकडे कहती बहुत कुछ, जो अनकहा है जो अनबुझ है जो रहस्यों की भीनी सी चादर में सिमटा सा है, जिसे जानने समझने की जिज्ञासा और जिज्ञासु मन, कहना मनन चिंतन में बुनता कभी प्रश्नों को चंदा मामा में चरखा कातती बूढी अम्मा सा, कहना कई मर्तबे मन के सागर में डूबता उतरता सीप में पैठ जाता मोती सा, और फिर स्वप्न संसार में हो जीवंत पाने को राह मुखौटे ओढ़े बहुरूपिये सा करता अट्ठाहस, और फिर कहीं दूर सिसकियों के साथ तीव्र होता है एक विलाप जो कह जाता है बहुत कुछ...........कहना जब समझ से परे हो जाता है तब उसका हश्र या नियति कुछ ऐसी ही स्थिति की नज़र हो जाती है...........है न

1 comment:

शुक्रिया