Thursday, November 7, 2013

गुरूर

सफलता आसमान पर
बिठा देती है इंसान को
मन लेता है हिलोरे
चाहतें है कहती
आसमां तू छू ले
अमृत मंथन में मिला
जैसे अमृत संग विष भी
उसी तरह सफलता देती है
नाम शौर्य के साथ
गुरुर अभिमान भी
सफ़लता की हर पायदान को
चूमते कदम गर हो दृढ़
तो रहता है मन
यथार्थ धरातल से जुड़ा
उसी पर टिका
सहज सरल सा
लेकिन जरा सी लापरवाही
उड़ने लगता है जीव गगन में
छूने लगता चाँद और सितारे
और फिर ठोस धरातल
रह जाता दूर धूमिल होता
हो जाता ओझल नज़रों से
चकाचौंध चुंधिया देती आँखों को
और गुरुर का चश्मा
चढ़ जाता सपनीली आँखों पर
उंचाई पर पहुचने का नशा
और उसकी लत
इंसा भी ना रहने देती
पतन को कर अनदेखा
छोड़ सबको पीछे
आगे बढ़ जाने की लालसा
विशालकाय सर्प सी कुंडली
कसती अपना घेरा
सब लगता क्षुद्र सा
और अहम् सर
चढ़कर है बोलता
केवल मैं ही रह जाता करीब
और बाकी सब जाता पीछे छूट
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9 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (08-11-2013) को "चर्चा मंचः अंक -1423" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

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    1. शुक्रिया राजेंद्र जी ..............हम अवश्य आयेंगे ..............शुभं

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    1. राजीव जी आभार ........समय मिलते ही हम अवश्य पढेंगे आपकी नई पोस्ट्स .........शुभं

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    1. दी शुक्रिया .............सुप्रभात

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  4. http://hindibloggerscaupala.blogspot.in/अंक ४१ शुक्रवार चौपाल में आपकी रचना को शामिल किया गया हैं कृपया अवलोकन हेतु पधारे ..धन्यवाद

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    1. दी एक बार फिर हार्दिक आभार .........जरुर

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  5. बहुत सुन्दर रचना

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शुक्रिया